कोरबा,24 नवम्बर (वेदांत समाचार)। SECL दीपका क्षेत्र द्वारा मलगांव ग्राम के भूमि अधिग्रहण के बाद यहाँ संचालित आदिम जाति कल्याण प्राथमिक शाला मलगांव को प्राथमिक शाला झाबर में विलय कर दिया गया है। इस प्रक्रिया का सर्वाधिक दुष्प्रभाव उस स्कूल में कार्यरत 70 प्रतिशत श्रवण दिव्यांग (बहरेपन) के शिकार बहादुर चौहान पर पड़ा है, जो पिछले 12 वर्षों से कलेक्टर दर पर अंशकालीन स्विपर के रूप में सेवाएँ दे रहे थे। स्कूल के मर्ज होने के बाद से बहादुर चौहान बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, बहादुर चौहान पिता स्व. बलिराम चौहान, जाति गांड़ा (SC), वर्ष 2012 में कलेक्टर आदिवासी विकास विभाग के आदेश एवं विकासखंड शिक्षा अधिकारी कटघोरा के निर्देशानुसार आदिम जाति कल्याण प्राथमिक शाला मलगांव में अंशकालीन स्विपर के रूप में नियुक्त किए गए थे। वे विद्यालय की साफ-सफाई का कार्य अनवरत 12 वर्षों तक निष्ठा और ईमानदारी के साथ करते रहे।
मलगांव स्कूल के SECL क्षेत्र में आने और भू-अर्जन प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद विद्यालय को प्राथमिक शाला झाबर में सम्मिलित कर दिया गया। विद्यालय समाप्त होने के कारण बहादुर चौहान का रोजगार भी स्वतः समाप्त हो गया। परंतु अब तक उन्हें किसी भी विद्यालय में पुनः समायोजित नहीं किया गया है।
स्थानीय ग्रामीणों एवं पूर्व विद्यालय स्टाफ के अनुसार बहादुर चौहान अपने कार्य के प्रति अत्यंत जिम्मेदार, निष्ठावान और अनुशासित रहे हैं। नशे से दूर रहने वाले बहादुर किसी भी प्रकार की अनावश्यक छुट्टी नहीं लेते थे। वर्तमान में उनके दो बच्चे हैं और परिवार पूरी तरह उन्हीं पर आश्रित है। नौकरी चले जाने से परिवार आर्थिक संकट से गुजर रहा है।
झाबर स्थित आदिम जाति कल्याण प्राथमिक शाला की प्रधान पाठक ने भी बहादुर चौहान को पुनः समायोजित किए जाने पर सकारात्मक सहमति व्यक्त की है। लेकिन यह प्रक्रिया जिला प्रशासन की अनुशंसा के बिना संभव नहीं है।
ग्रामीणजन एवं जनप्रतिनिधियों का कहना है कि 70 प्रतिशत दिव्यांगता से ग्रस्त बहादुर चौहान बाहरी रोजगार पाने में सक्षम नहीं हैं, ऐसे में प्रशासन को मानवता के आधार पर उन्हें पुनः रोजगार से जोड़ने हेतु कदम उठाने चाहिए।
लोगों ने कलेक्टर कोरबा से मांग की है कि SECL विस्थापन से प्रभावित इस दिव्यांग सफाईकर्मी को प्राथमिक शाला झाबर में अंशकालीन स्विपर के पद पर समायोजित कर मानवता की मिसाल कायम करें।



