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भीष्म को इच्छामृत्यु का था वरदान, फिर भी उत्तरायण की प्रतीक्षा क्यों की?

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महाभारत का युद्ध केवल शस्त्रों की लड़ाई नहीं था, बल्कि यह धर्म, मर्यादा और उच्च आदर्शों की पाठशाला भी था. इस महागाथा के सबसे शक्तिशाली पात्रों में से एक, भीष्म पितामह, अपनी प्रतिज्ञा और शक्ति के लिए जाने जाते हैं. उन्हें अपने पिता राजा शांतनु से इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त था, यानी उनकी मृत्यु तभी हो सकती थी जब वे स्वयं चाहें. इसके बावजूद, अर्जुन के बाणों से छलनी होकर बाणों के बिस्तर पर लेटने के बाद भी उन्होंने कई दिनों तक प्राण नहीं त्यागे. उन्होंने सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार किया. आखिर क्यों? पंचांग के अनुसार, साल 2026 में भीष्म अष्टमी 26 जनवरी को पड़ेगी जो कि 25 जनवरी की रात 11:10 बजे से प्रारंभ होकर 26 जनवरी की रात 09:17 बजे तक रहेगी. आइए जानते हैं इसके पीछे के धार्मिक और आध्यात्मिक कारण.

इच्छामृत्यु का वरदान और भीष्म का संकल्प
पितामह भीष्म को उनके पिता राजा शांतनु से इच्छामृत्यु का अद्भुत वरदान प्राप्त था. इस वरदान का अर्थ था कि वे मृत्यु को तभी स्वीकार करेंगे, जब स्वयं चाहेंगे. महाभारत युद्ध में भीष्म पितामह बाणों की शरशैया पर लेट गए थे, लेकिन तब भी उन्होंने प्राण नहीं त्यागे. यह उनका संकल्प था कि जीवन और मृत्यु भी धर्म के अनुसार होनी चाहिए. भीष्म जानते थे कि केवल शक्ति या वरदान ही नहीं, बल्कि सही समय और सही भाव से देह त्याग करना ही मोक्ष का मार्ग खोलता है. इसलिए उन्होंने अपने वरदान का उपयोग अधर्म या जल्दबाजी में नहीं किया, बल्कि काल की मर्यादा का सम्मान रखा.

उत्तरायण का आध्यात्मिक महत्व
शास्त्रों के अनुसार, सूर्य का उत्तरायण काल अत्यंत पवित्र और मोक्षदायी माना जाता है. उत्तरायण में सूर्य देव की गति उत्तर दिशा की ओर होती है, जिसे देवताओं का मार्ग कहा गया है. धार्मिक मान्यता है कि उत्तरायण में देह त्याग करने से आत्मा को सद्गति और मोक्ष की प्राप्ति होती है. पितामह भीष्म इस आध्यात्मिक सत्य से भलीभांति परिचित थे. उन्होंने यह दर्शाया कि इच्छामृत्यु का अर्थ मनमानी नहीं, बल्कि धर्म और शास्त्र सम्मत निर्णय होता है. इसी कारण उन्होंने शरशैया पर रहते हुए भी सूर्य के उत्तरायण होने तक धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा की और काल के नियमों का सम्मान किया.

अंतिम समय में धर्म को दिया महत्व
उत्तरायण की प्रतीक्षा के दौरान पितामह भीष्म ने शरशैया पर रहते हुए युधिष्ठिर को राजधर्म, आपद्धर्म और मोक्षधर्म का उपदेश दिया. यह समय केवल उनकी मृत्यु की प्रतीक्षा का नहीं, बल्कि धर्म की शिक्षा का काल भी था. भीष्म पितामह ने यह स्पष्ट किया कि जीवन का अंतिम समय समाज और भावी पीढ़ी के लिए मार्गदर्शन देने का अवसर होता है. उनके उपदेश आज भी शांति पर्व और अनुशासन पर्व के रूप में महाभारत का महत्वपूर्ण हिस्सा माने जाते हैं. इस प्रकार उत्तरायण की प्रतीक्षा केवल आध्यात्मिक कारणों से ही नहीं, बल्कि धर्म की स्थापना के लिए भी आवश्यक थी.

इच्छामृत्यु से जुड़ा गहरा संदेश
भीष्म पितामह का उत्तरायण की प्रतीक्षा करना मानव जीवन के लिए एक गहरा संदेश देता है. यह सिखाता है कि अधिकार और शक्ति के साथ संयम और मर्यादा भी आवश्यक है. इच्छामृत्यु का वरदान होते हुए भी उन्होंने काल, धर्म और प्रकृति के नियमों का पालन किया. भीष्म अष्टमी के दिन श्रद्धालु इसी त्याग, धैर्य और धर्मनिष्ठा को स्मरण करते हैं. आज के समय में भी भीष्म पितामह का यह निर्णय सिखाता है कि सही समय का इंतजार और धर्म के अनुसार किया गया निर्णय ही जीवन को सार्थक बनाता है. इसलिए उत्तरायण की प्रतीक्षा भीष्म के महान चरित्र का अमर उदाहरण मानी जाती है.

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