मद्देड-कुटरू के अवैध स्कूलों पर विभाग खामोश, फाइलों में फंसी शिक्षा
बीजापुर ,27अक्टूबर (वेदांत समाचार)। कहते हैं शिक्षा किसी भी समाज की रीढ़ होती है, लेकिन बीजापुर जिले के मद्देड और कुटरू ब्लॉक में यह रीढ़ अब कमजोर पड़ती जा रही है। यहां कई निजी स्कूल बिना किसी मान्यता या अनुमति के चल रहे हैं, और शिक्षा विभाग महीनों से इस पर मौन साधे बैठा है। जांच की बातें तो खूब होती हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर सिर्फ कागजी कवायद। सवाल उठता है — क्या विभाग खुद इन अवैध स्कूलों का संरक्षक बन गया है?
विभाग का रटा-रटाया जवाब- “जांच जारी है”
हर बार जब मीडिया यह मुद्दा उठाता है, शिक्षा विभाग का जवाब तय रहता है- “जांच की जा रही है, रिपोर्ट आने पर कार्यवाही होगी।” लेकिन यह जांच कब शुरू हुई, कब पूरी होगी और किस पर कार्रवाई होगी, इसका जवाब किसी के पास नहीं।
वहीं जिन स्कूलों को मान्यता नवीनीकरण के लिए समय पर नोटिस भेजे जाते हैं, उन्हीं के बगल में बिना मान्यता वाले स्कूल वर्षों से खुलेआम चल रहे हैं। मद्देड और कुटरू क्षेत्र के इन स्कूलों ने बिना पंजीयन के न केवल शिक्षण कार्य शुरू कर रखा है, बल्कि फीस वसूली और प्रमाणपत्र देने का काम भी धड़ल्ले से जारी है। शिक्षा का यह “बाजारीकरण” अब प्रशासन की आंखों के सामने चल रहा है।
जिले में दो DEO, लेकिन जवाब किसी के पास नहीं
बीजापुर में दो जिला शिक्षा अधिकारियों की स्थिति किसी पहेली से कम नहीं। नतीजा — फाइलें एक-दूसरे की मेज पर घूमती रहती हैं, और जिम्मेदारी तय नहीं हो पाती। विभागीय सूत्र बताते हैं कि समन्वय की कमी के चलते कार्रवाई प्रभावित हो रही है। अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचते और जांच रिपोर्ट सिर्फ कागजों में तैयार हो जाती है।
अवैध स्कूलों में ‘शिक्षा’ नहीं, ‘व्यवसाय’
कई ऐसे संस्थान हैं जिनके पास न तो भवन स्वीकृति है, न शिक्षक प्रशिक्षण की योग्यता। कुछ स्कूल तो विभागीय निरीक्षण से बचने के लिए दूसरे स्कूलों के कोड का उपयोग कर रहे हैं — यानी जिन स्कूलों की मान्यता है, उनके नाम पर परीक्षा फॉर्म भरे जा रहे हैं। यह न केवल शिक्षा अधिनियम का उल्लंघन है, बल्कि गंभीर धोखाधड़ी भी है। इन स्कूलों में शिक्षक उपस्थिति रजिस्टर अधूरा है, विद्यार्थियों का रिकॉर्ड गायब है, फिर भी हर महीने भारी फीस वसूली जा रही है। शिक्षा के नाम पर “कमाई का ठेका” बन चुके ये स्कूल अब बच्चों के भविष्य को दांव पर लगा रहे हैं।
विभाग सिर्फ दिखावा करता है : अभिभावक
एक स्थानीय अभिभावक का कहना है — “हमको बाद में पता चला कि स्कूल के पास मान्यता नहीं है, लेकिन अधिकारी सिर्फ जांच के नाम पर आते हैं, फोटो खींचकर चले जाते हैं।”
वहीं भोपालपटनम के एक राजनीतिक दल के नेता ने कहा — “स्कूल संचालक बच्चों के नाम किसी और स्कूल में जोड़कर परीक्षा दिलवाते हैं। बाद में पता चलता है कि असली स्कूल का अस्तित्व ही नहीं।”
जनप्रतिनिधियों की आवाज़ भी बेअसर
स्थानीय जनप्रतिनिधियों का कहना है कि शिक्षा की आड़ में चल रहे ये “कमाई के अड्डे” बंद होने चाहिए। सरकार बच्चों की शिक्षा पर करोड़ों खर्च कर रही है, लेकिन विभाग की निष्क्रियता से जमीनी स्तर पर कोई असर नहीं दिख रहा।
कौन है जिम्मेदार?
सबसे बड़ा सवाल — इतने बड़े अनियमितता के बावजूद किसी अधिकारी पर कार्रवाई क्यों नहीं? अगर विभाग कहता है कि उसे जानकारी नहीं थी, तो यह उसकी कार्यकुशलता पर प्रश्नचिह्न है। और अगर जानकारी होने के बावजूद कार्रवाई नहीं की गई, तो यह स्पष्ट मिलीभगत का संकेत है।
फाइलों में दबी सच्चाई
जिला शिक्षा कार्यालय में इन शिकायतों से जुड़ी फाइलें महीनों से लंबित हैं। कुछ फाइलों को जांच रिपोर्ट का इंतजार बताया जा रहा है, जबकि सच्चाई यह है कि अधिकारी इन्हीं फाइलों के पीछे छिपकर जवाबदेही से बच रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, कुछ प्रभावशाली स्कूल संचालकों के संपर्क विभाग के अंदर तक हैं, जिससे फाइलों की गति जानबूझकर धीमी की जा रही है।
कब जागेगा शिक्षा विभाग?
अब यह मामला केवल स्कूल बंद करने का नहीं, बल्कि पूरे विभाग की साख का है। जरूरत है कि मद्देड और कुटरू सहित पूरे बीजापुर जिले के निजी स्कूलों का भौतिक सत्यापन कराया जाए। बिना मान्यता वाले स्कूलों को तत्काल बंद कर संचालकों पर एफआईआर दर्ज की जाए। साथ ही वर्षों से जांच लटकाने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय हो, तभी बच्चों का भविष्य सुरक्षित रहेगा।



