Vedant Samachar

कोयला खनन ने कोरबा के जंगलों को तबाह किया, 35.56% से घटकर 14% रह गई वनस्पति

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कोरबा, 20 जुलाई 2025। छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में कोयला खनन के कारण जंगलों की कटाई ने पर्यावरणीय संतुलन को बिगाड़ दिया है। एक नए शोध में पता चला है कि कोरबा में जंगल कवर 1995 में 35.56% से घटकर 2024 में मात्र 14% रह गया है।

इस अध्ययन में कोयला खनन, खासकर खुले खनन कार्यों के कारण क्षेत्र की प्राकृतिक संरचना में बड़े बदलावों और इसके गंभीर पारिस्थितिक परिणामों को रेखांकित किया गया है। वर्तमान में कोरबा में 13 कोयला खदानें संचालित हो रही हैं, और 4 अन्य खदानें शुरू होने की प्रक्रिया में हैं।

अनुमान है कि 2025 तक कोरबा में कोयला उत्पादन 180 मिलियन टन के शिखर पर पहुंच जायेगा। शोधकर्ताओं ने बताया कि कोयला खनन भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन कोरबा में इसकी कीमत पर्यावरण को चुकानी पड़ रही है।

संत गहिरा गुरु विश्वविद्यालय अंबिकापुर के पर्यावरण विज्ञान विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. जॉयस्तु दत्ता ने कहा, “हमारे अध्ययन ने 1995 से 2024 तक कोरबा में कोयला खनन के कारण भूमि उपयोग और भूमि आवरण में हुये बदलावों की व्यापक स्थिति को समझने की कोशिश की है। साथ ही, क्षतिग्रस्त परिदृश्य को पुनर्जनन के लिये अपर्याप्त रणनीतियों की समस्या भी बनी हुई है।”

अध्ययन के अनुसार, कोरबा में जंगल कवर 1995 में 35.56% से घटकर 2024 में मात्र 14% रह गया है, जबकि कोयला खनन क्षेत्रों और बंजर भूमि में काफी वृद्धि हुई है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, अमरकंटक के प्रोफेसर तरुण ठाकुर ने कहा, “प्राकृतिक परिदृश्य में परिवर्तन के कारण पारिस्थितिक सेवाओं पर गंभीर प्रभाव पड़ा है, जल संग्रहण क्षमता घटी है, मिट्टी का कटाव बढ़ा है और जैव विविधता में कमी आई है।”

शोध में रिमोट सेंसिंग डेटा और जियोस्पेशियल विश्लेषण का उपयोग कर भूमि क्षरण की मात्रा को सटीक रूप से मापा गया और लैंड डिग्रेडेशन वल्नरेबिलिटी इंडेक्स (LDVI) के माध्यम से पर्यावरणीय जोखिम का आकलन किया गया।

स्रोत,सीजी खबर

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