भिलाई,25जून(वेदांत समाचार) । वीरांगना रानी दुर्गावती बलिदान दिवस एवं सम्मान समारोह का भव्य आयोजन बैकुंठ धाम मड़ोदा नेवई में किया गया, जिसमें छत्तीसगढ़ की समृद्ध आदिवासी परंपरा और लोककला की जीवंत झलक देखने को मिली। कार्यक्रम में प्रदेश भर से जुटे लोक कलाकारों और समाजसेवियों को विभिन्न श्रेणियों में सम्मानित किया गया।
रानी दुर्गावती के बलिदान को किया नमन
आयोजन की शुरुआत वीरांगना रानी दुर्गावती के बलिदान को स्मरण करते हुए की गई। संयोजक पद्मश्री डॉ. राधेश्याम बारले ने बताया कि 24 जून 1564 को रानी ने स्वतंत्रता के लिए लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की थी। उन्होंने इसे “हमारी अस्मिता का प्रतीक” बताया।
मुख्य अतिथि तिमिरेंद्र शेखर सिंह कंवर ने रानी दुर्गावती को स्वतंत्रता संग्राम की अग्रणी योद्धा बताया। विशिष्ट अतिथि मोना सेन (अध्यक्ष, केश शिल्प कल्याण बोर्ड) ने उनके महिला शिक्षा के प्रयासों को ऐतिहासिक बताया।
कलाकारों ने बाँधा समा
कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण रहे काकसार नृत्य (नारायणपुर), सुवा नृत्य (नेवई महिला मंडली) और पंथी नृत्य (डुमर अहिवारा)। लोकगायक तुषांत बारले, चंद्रिका आर्या, खुमेश मानिकपुरी, और कल्याणी बारले ने शानदार प्रस्तुति दी। लोकगायक तुषांत बारले के गीत “वंस मोर” ने आयोजन स्थल को गुंजायमान कर दिया।
सम्मान समारोह में छाया महिला सशक्तिकरण
इस अवसर पर 15 ख्याति प्राप्त लोक कलाकारों को पुरोधा सम्मान, 30 महिला स्व-सहायता समूहों को रानी दुर्गावती नारी शक्ति सम्मान, और 32 महिलाओं को व्यक्तिगत उत्कृष्ट कार्य हेतु सम्मानित किया गया।
प्रमुख सम्मानित हस्तियां:
डॉ. विनीत ध्रुवे (दुर्ग), चंद्रिका आर्या (बालोद), सुशील साहू (नंदकट्ठी), कविता वासनिक, हिरदेश सिन्हा, तुषांत बारले, पुष्पा शंकर साहू, विनीता ढीमर, कल्याणी बांधे, डॉ. गार्गी पांडेय, गीता कोठारी सहित कई सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षाविद और लोक कलाकार शामिल रहे।
समापन पर जताया आभार
समिति अध्यक्ष राजू लाल नेताम ने समस्त अतिथियों, कलाकारों और सहभागी समाजसेवियों का आभार जताया। इस आयोजन ने वीरांगना रानी दुर्गावती की गौरवगाथा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के साथ ही आदिवासी लोक संस्कृति और महिला सशक्तिकरण को एक सशक्त मंच प्रदान किया।



