Vedant Samachar

इंफेक्शन होने पर डॉक्टर क्यों कराते हैं ESR टेस्ट, इसके बढ़ने या घटने के क्या हैं मायने?

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ESR यानी Erythrocyte Sedimentation Rate, एक ऐसा टेस्ट है जो खून में मौजूद रेड ब्लड सेल्स (RBCs) के नीचे बैठने की गति को मापता है. यह टेस्ट बहुत सरल है और किसी भी उम्र के व्यक्ति पर किया जा सकता है. डॉक्टर इसे अक्सर इसलिए लिखते हैं क्योंकि यह शरीर में चल रही सूजन या किसी असामान्य प्रक्रिया का संकेत देता है. ESR खुद किसी बीमारी का नाम नहीं बताता, लेकिन यह दर्शाता है कि शरीर के अंदर कुछ गड़बड़ी हो सकती है. यही वजह है कि इसे शुरुआती जांच के तौर पर किया जाता है.

आइए जानते हैं कि ESR टेस्ट क्यों कराया जाता है, यह कैसे काम करता है और इसे किस आधार पर मापा जाता है. साथ ही, जानते हैं कि टेस्ट के दौरान किन चीजों का ध्यान रखना चाहिए.

क्यों कराया जाता है ESR टेस्ट?
दिल्ली एम्स में रेडियोलॉजी विभाग के पूर्व डॉ. सुन्नकर दत्त बताते हैं कि ESR टेस्ट इसलिए कराया जाता है क्योंकि यह शरीर में चल रही आंतरिक सूजन का शुरुआती संकेत देता है. जब शरीर पर किसी वायरस, बैक्टीरिया, ऑटोइम्यून बीमारी या चोट का असर होता है, तो खून में कुछ विशेष प्रोटीन बढ़ जाते हैं. ये प्रोटीन रेड ब्लड सेल्स को एक-दूसरे से चिपकाकर तेजी से नीचे बैठने में मदद करते हैं. इसी वजह से ESR का स्तर बढ़ जाता है.

यह टेस्ट डॉक्टरों को इस बात की जानकारी देता है कि शरीर में सूजन, संक्रमण, गठिया, बुखार, फेफड़ों या आंतों की समस्या जैसी कोई एक्टिव प्रक्रिया चल रही है या नहीं. यह टेस्ट किसी बीमारी की खुद पुष्टि नहीं करता, बल्कि डॉक्टर को आगे कौन सी जांच करनी चाहिए, इसका संकेत देता है. इसलिए कई बार बुखार लंबे समय तक रहना, जोड़ों में दर्द, कमजोरी या संक्रमण की आशंका में यह टेस्ट लिखा जाता है.

कैसे मापा जाता है ESR टेस्ट?
डॉ. सुन्नकर दत्त ने बताया कि ESR टेस्ट में खून का सैंपल एक लंबी, पतली ट्यूब में रखा जाता है और एक घंटे तक इसे स्थिर छोड़ दिया जाता है. समय पूरा होने पर देखा जाता है कि रेड ब्लड सेल्स कितने नीचे बैठे हैं. जितनी जल्दी वे नीचे जाते हैं, ESR उतना अधिक माना जाता है.

अगर ESR बढ़ा हुआ हो, तो यह शरीर में सूजन, संक्रमण, टिश्यू डैमेज या ऑटोइम्यून बीमारी का संकेत देता है. इससे बुखार, कमजोरी, जोड़ों में दर्द या थकान जैसी समस्याएं हो सकती हैं. वहीं, ESR कम होना आमतौर पर सामान्य माना जाता है, लेकिन कभी-कभी डिहाइड्रेशन या कुछ दवाओं के कारण भी कम आ सकता है. यह टेस्ट शरीर में हो रहे बदलावों की दर्शाता है.

टेस्ट के दौरान किन चीजों का ध्यान रखें
टेस्ट से पहले डॉक्टर को बताएं कि कोई दवा ले रहे हों.

खाली पेट या नॉर्मल, जैसा डॉक्टर बताए, वैसा ही फॉलो करें.

टेस्ट से पहले अधिक थकान या तनाव से बचें.

रिपोर्ट की तुलना हमेशा डॉक्टर से करवाएं, खुद अनुमान न लगाएं.

अगर बार-बार टेस्ट की जरूरत पड़े, तो दो टेस्ट के बीच पर्याप्त गैप रखें.

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