Vedant Samachar

किराया देना बेहतर हैं या होम लोन की EMI भरें? आपको भी चौंका देगा ये कैलकुलेशन

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अक्सर कहा जाता है कि किराए में रहने से अच्छा है EMI भरकर अपना घर ले लो. सुनने में यह सलाह आसान लगती है, लेकिन असल में इस सोच के पीछे कुछ ऐसे छिपे हुए जोखिम हैं, जो मिडिल क्लास के लिए खतरा बन सकते हैं.

सोचिए 15–20 साल एक ही EMI चुकानी पड़े, और बीच में नौकरी बदलना, शहर बदलना या आय घट जाना जैसी समस्याएं आ जाएं तो EMI का बंधन आपकी वित्तीय आजादी को खत्म कर देता है. वहीं किराए में उतना दबाव नहीं होता. यही वह गणित है जिसे लोग अनदेखा कर देते हैं और बाद में यही सबसे बड़ा झटका देता है.

लोग मानते हैं कि EMI देना किराया देने जैसा ही है, लेकिन कैलकुलेशन कुछ और बताता है. लंबी अवधि के होम लोन में आपका ब्याज कई बार मूल रकम से भी ज्यादा निकल जाता है. यानी जो घर 80–90 लाख का है, उसे चुकाते-चुकाते आप 1.6–1.7 करोड़ खर्च कर देते हैं. यह अंतर कई लोगों को बाद में समझ आता है.

घर खरीदने में भारी ईएमआई के साथ ही आजादी खो देने का बोझ भी व्यक्ति के ऊपर आ जाता है. किराया आपको जगह बदलने, नौकरी बदलने और करियर में तेजी से फैसले लेने की आजादी देता है. वहीं EMI आपको एक ही शहर और एक ही फैसले में बांध देती है.

कई बार जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, EMI का तनाव और बढ़ता है और ईएमआई आर्थिक के साथ-साथ एक मानसिक बोझ भी बन जाता है. ऐसे में एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि घर खरीदने की प्लानिंग सोच-समझ कर करें, अगर परिस्थियां सही ना लगे तो किराया देने में ज्यादा समझदारी वाला विकल्प होता है.

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