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Mahabharat: इच्छा मृत्यु का मिला था वरदान, फिर भी बाणों की शैय्या पर पड़े रहे पितामह भीष्म, जानें क्यों नहीं त्यागे प्राण?

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महाभारत का युद्ध द्वापर युग में हुआ था. महाभारत का युद्ध 18 दिनों तक चला था. ये युद्ध इतिहास का सबसे बड़ा और भीषण युद्ध माना जाता है. भीष्म पितामह महाभारत के प्रमुख प्रात्रों में से एक बताए जाते हैं. भीष्म पितामह का नाम देवव्रत था, लेकिन उनके द्वारा आजीवन ब्रह्मचारी रहने और कभी विवाह न करने की भीषण प्रतिज्ञा करने के बाद उनका नाम भीष्म पड़ गया.

पितामह भीष्म महाभारत युद्ध के सबसे उम्रदराज योद्धा थे, लेकिन इसके बाद भी वो बहुत शक्तिशाली थे. पितामह भीष्म को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था. ये वरदान उनको उनके पिता और हस्तिनापुर के महाराज शांतनु ने ही दिया था. इच्छा मृत्यु के वरदान के कारण ही भीष्म पितामह कई दिनों तक बाणों की शैय्या लेटे रहे और अपने प्राण नहीं त्यागे. आइए इसके पीछे की वजह जानते हैं.

भीष्म पितामह थे पांडवों के लिए बड़ी चुनौती
भीष्म पितामह को उनके पिता और हस्तिनापुर के महाराज शांतनु ये वरदान दिया था कि जब तक भीष्म स्वंय नहीं चाहेंगे वो इस मृत्यु लोक त्यागकर नहीं जाएंगे. पितामह भीष्म हस्तिनापुर के सिंहासन से बंंधे और अपने कर्तव्यों का पाहन करते हुए उन्होंने महाभारत के युद्ध में कौरवों का साथ दिया था.युद्ध में भीष्म पांडवों के लिए एक बड़ी चुनौती बने हुए थे. उनको परस्त किए बिना युद्ध नहीं जीता जा सकता था.

भीष्म पीतामह के प्राण न त्यागने की वजह ये थी
ऐसे में अर्जुन ने शिखंडी को आगे करके पितामह भीष्म पर अपने बाणों की वर्षा कर दी थी, जिससे पितामह बुरी तरह घायल हो गए थे, लेकिन उन्होंने तुरंत अपने प्राणों का त्याग नहीं किया था. इसके बीछे सबसे पहला कारण तो यह माना जाता है कि पितामह सूर्य के उत्तरायण होने पर प्राण त्यागना चाहते थे. हिदू धर्म में मान्यता है कि इस समय मृत्यु को प्राप्त करने वाला मोक्ष को प्राप्त करता है.

पितामह जब घायल हुए तो सूर्य दक्षिणायन में था. ऐसे में सूर्य के उत्तरायण होने के लिए भीष्म पितामह ने 58 दिनों तक लंबा इंतजार किया. भीष्म पितामह द्वारा प्राण न त्यागने का दूसरा कारण था उनकी हस्तिनापुर को सुरक्षित देखने की इच्छा. इसलिए पितामह ने तब तक प्राण नहीं त्यागे जब तक हस्तिनापुर का भविष्य सुरक्षित नहीं हो गया.

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