भारत में रेल यात्रा सिर्फ एक सफर नहीं, बल्कि हमारे जीवन का एक अभिन्न हिस्सा है. हम अपनी रेलवे को देश की ‘लाइफलाइन’ कहते हैं, और यह सच भी है क्योंकि हमारा रेल नेटवर्क दुनिया का चौथा सबसे बड़ा नेटवर्क है. लेकिन अक्सर हमारे मन में यह सवाल आता है कि आखिर दुनिया में वह कौन सा देश है, जिसका रेल नेटवर्क सबसे विशाल है? अगर आप सोच रहे हैं कि यह चीन या रूस होगा, तो आप गलत हैं. दुनिया का सबसे लंबा और बड़ा रेल नेटवर्क अमेरिका (USA) के पास है. यह नेटवर्क इतना विशाल है कि इसके आंकड़े किसी को भी चौंका सकते हैं.
अमेरिकी परिवहन विभाग और एसोसिएशन ऑफ अमेरिकन रेलरोड्स के आंकड़ों पर नजर डालें, तो अमेरिका का रेलवे नेटवर्क 2,20,000 किलोमीटर से भी ज्यादा इलाके में फैला हुआ है. इसकी विशालता का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि अगर इन पटरियों को एक सीधी रेखा में जोड़ा जाए, तो पृथ्वी के लगभग पांच चक्कर लगाए जा सकते हैं.
प्राइवेट कंपनियां चलाती हैं पूरा सिस्टम
ज्यादातर देशों में, जिनमें भारत भी शामिल है, रेलवे का संचालन और नियंत्रण पूरी तरह से सरकार के हाथों में होता है. लेकिन अमेरिका ने एक बिल्कुल अलग रास्ता चुना. वहां रेलवे का ढांचा और संचालन बड़े पैमाने पर निजी कंपनियों (Private Companies) के पास है. यह मॉडल आज का नहीं, बल्कि 1800 के दशक का है. उस दौर में देश के पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों को जोड़ने की जिद ने वहां एक औद्योगिक क्रांति को जन्म दिया था.
विभिन्न निजी रेल कंपनियों के बीच एक होड़ मची थी कि कौन पहले देश के एक छोर को दूसरे छोर से जोड़ता है. इसी प्रतिस्पर्धा का नतीजा था कि 1869 में पहली ट्रांसकॉन्टिनेंटल रेल लाइन बनकर तैयार हुई. इस निजीकरण ने अमेरिका में रेल नेटवर्क का विस्तार इतनी तेजी से किया, जिसकी बराबरी आज भी कोई दूसरा देश नहीं कर पाया है. समय के साथ छोटी कंपनियां मिलकर बड़ी होती गईं और आज यूनियन पैसिफिक (Union Pacific), बीएनएसएफ रेलवे (BNSF) और सीएसएक्स (CSX) जैसी दिग्गज कंपनियां इस विशाल तंत्र को अपने कंधों पर संभाले हुए हैं.
कितना बड़ा है अमेरिका का रेल कारोबार
IBIS वर्ड के एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 के अंत तक अमेरिका का रेल ट्रांसपोर्ट इंडस्ट्री करीब 103 बिलियन डॉलर की होने का अनुमान है. सिर्फ माल ढुलाई की बात करें तो यह बाजार 2025 में 71.77 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है और 2030 तक 84.79 बिलियन डॉलर होने की उम्मीद है. जुलाई 2024 की तुलना में 2025 में रेल फ्रेट वॉल्यूम 2.4% बढ़ा है, जो इंटरमॉडल ट्रैफिक में बढ़ोतरी दिखाता है. कोयला छोड़कर बाकी कारलोड में भी 4.7% की बढ़त दर्ज की गई, जिससे साफ है कि रेल इंडस्ट्री की मांग बढ़ रही है.
यात्री ट्रेनें सुस्त, पर मालगाड़ियां हैं ‘सुपरस्टार’
जब हम हाई-स्पीड ट्रेनों या बुलेट ट्रेनों की बात करते हैं, तो जापान, चीन और यूरोप के देश सबसे आगे नजर आते हैं. इस मामले में अमेरिका, दुनिया के बाकी विकसित देशों से थोड़ा पिछड़ा हुआ दिखाई देता है. वहां ट्रेनें तो बहुत हैं, लेकिन यात्री ट्रेनों की स्पीड औसत ही है. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि अमेरिका का रेलवे सिस्टम यात्रियों के बजाय माल ढुलाई (Freight) पर केंद्रित है.
अमेरिका की पटरियों पर असली राजा मालगाड़ियां हैं. वहां ‘एमट्रैक’ (Amtrak) जैसी सरकारी यात्री सेवा चलती तो है, लेकिन जिन पटरियों पर वह दौड़ती है, उनका मालिकाना हक ज्यादातर प्राइवेट फ्रेट कंपनियों के पास ही है. इसलिए वहां मालगाड़ियों को प्राथमिकता मिलती है. माल ढुलाई के मामले में अमेरिका का कोई सानी नहीं है. वहां का लगभग 28% माल रेलवे के जरिए ही ढोया जाता है.
इसकी क्षमता ऐसे समझें, अमेरिका में एक अकेली मालगाड़ी उतना सामान एक बार में ले जा सकती है, जितना 280 ट्रक मिलकर ले जाते हैं. यह न केवल सड़कों से भीड़ कम करता है, बल्कि बेहद किफायती भी है. एक टन सामान को करीब 480 मील (लगभग 770 किमी) तक ले जाने में सिर्फ एक गैलन ईंधन का खर्च आता है. यही कारण है कि वहां कोयला, अनाज, तेल, कारें और भारी मशीनें ढोने के लिए रेलवे ही पहली पसंद है.
अमेरिकी अर्थव्यवस्था की धड़कन
अमेरिका का यह रेल नेटवर्क सिर्फ लोहे की पटरियों का जाल नहीं है, बल्कि इसे वहां की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है. देश के बंदरगाह, औद्योगिक शहर, खेती-किसानी वाले ग्रामीण इलाके और बड़े बाजार सब कुछ इस नेटवर्क से जुड़कर एक मजबूत सप्लाई चेन बनाते हैं. यह रेलवे सिस्टम सालाना अरबों डॉलर की आर्थिक गतिविधि पैदा करता है. सबसे खास बात यह है कि चूंकि यह प्राइवेट हाथों में है, इसलिए इसके इंफ्रास्ट्रक्चर और रखरखाव पर होने वाला भारी-भरकम निवेश भी ये कंपनियां खुद करती हैं, सरकार पर इसका बोझ कम पड़ता है.



