Vedant Samachar

HAQ: वो 5 मौके, जब इमरान हाशमी पर भारी पड़ीं यामी गौतम, क्लाइमैक्स नहीं, इस तीसरे प्वाइंट ने दिलाई असली जीत

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मुंबई : HAQ तलाक, तलाक, तलाक… क्या सच में पूरा मसला ही इसी जगह से शुरू हुआ? शायद फिल्म देख चुके कई लोगों का जवाव ‘हां‘ हो. पर मेरा जवाब बिल्कुल न है. यामी गौतम और इमरान हाशमी की HAQ बहुत से सवाल छोड़ती है. जिनके जवाब फिल्म में मिलेंगे, पर कुछ जवाब इंसान को खुद ही ढूंढने पड़ते हैं. यह फिल्म हर जगह महिलाओं के अधिकारों की बात करती है. तब भी जब एक पत्नी बेगम से पहली बेगम बन जाती है. तब भी जब पति झूठ बोलकर दूसरी शादी करता है. तब भी जब वो बच्चों को लेकर अलग जाने का फैसला करती है और तब भी जब उसे तीन तलाक दे दिया जाता है.

यह कहानी है शाजिया बानो की, जिसे यामी गौतम ने निभाया है. जो पति और जाने-माने वकील अब्बास खान (इमरान खान) के खिलाफ आवाज बुलंद करती है. अपने बच्चों के मुआवजे का मामला कोर्ट में लेकर पहुंचती है और जज से ऐसा सवाल पूछती है, जो सच में सोचने पर मजबूर करता है. यूं तो सुपर्ण वर्मा की फिल्म में और भी ऐसे कई एक्टर्स हैं, जिन्होंने अपना किरदार बखूबी निभाया. पर यामी गौतम एक जगह ऐसी नहीं थी, जब कहीं कम पड़ी हों.

यामी गौतम ने फिल्म में एक अहम किरदार निभाया है, जहां उनके सामने इमरान हाशमी थे. जो खुद एक बेहतरीन एक्टर हैं, साथ ही जब सुप्रीम कोर्ट में उन्हें बोलते हुए दिखाया गया वो सीक्वेंस बहुत ही जबरदस्त था. पर एक पत्नी से, तीन बच्चों की मां और फिर अपने हक के लिए लड़ती बानो की बदलती कहानी को यामी इतनी खूबसूरती से दिखा पाएगी. यह सवाल शायद कई लोगों के दिमाग में होगा. तो जिन लोगों ने फिल्म नहीं देखी, उन्हें देखनी चाहिए क्योंकि यहां आगे भर-भरकर स्पॉइलर्स मिलेंगे, तो समझिए कैसे यामी गौतम का किरदार बेस्ट नहीं शायद उससे भी कई ज्यादा है. जिसके आगे इमरान हाशमी भी फीके पड़ गए.

यामी गौतम ने 5 फेज में जीता सबका दिल

  1. पहला फेज: यहां वो शाजिया बानो दिखाई गई, जब नई-नई शादी के बाद वो अब्बास खान के घर आई. कुछ नया करना चाहा, तो उसे अपनी मर्जी से किया भी. लेकिन तब उनका किया बदलाव पति को खला नहीं. जबकि आगे बढ़कर जमीन का वो हिस्सा, उन्होंने शाह बानो के नाम कर दिया. इस फेज में यामी गौतम ने बड़ी शांति और सरलता के साथ किरदार निभाया. उनका अभिनय एक ही ट्रैक पर खूबसूरती से चलता गया और कहीं नहीं महसूस होता कि कुछ ओवर या एक्स्ट्रा करने की कोशिश की गई हो.
  2. दूसरा फेज: जहां शाह बानो के सामने अब्बास खान की दूसरी बीवी की एंट्री होती है. पत्नी को कोई और कहानी सुनाकर वो शादी कर घर ले आते है. वहीं यह पत्नी नाराज है और परेशान भी, पर उस दूसरी बीवी को अपनाने को तैयार हैं. यहां यामी गौतम की एक्टिंग एक पड़ाव और पार करती है. जब उसे पति की सच्चाई के बारे में पता लगता है और अब्बास खान से बिना डरे वो सवाल करती है. यहां भी यामी उसी ट्रैक पर थीं, पर इस बार उनकी एक्टिंग एक लेवल ऊपर गई. जहां इमोशंस, गहराई दिखती है. साथ ही दिखता है अकेलापन.
  3. तीसरा फेज: जब शाह बानो ने सबकुछ भुलाकर सिर्फ पहली बेगम बनना चुना. यही वो फेज है, जहां यामी गौतम की एक्टिंग में दो अलग-अलग रंग दिखे. पहला रंग, जब वो पति के ऑफिस जाकर एनिवर्सरी पर एक फिल्म देखने की गुजारिश करती है. और उसके बदले में सिर्फ पति का साथ चाहती हैं, पर वहां कुछ नहीं मिलता. और दूसरा रंग वो शांति, जब शाह बानो का किरदार निभा रहीं यामी गौतम तीनों बच्चों को लिए चुपचाप अपने घर चली जाती है. उनका पालन पोषण करती हैं और महीने का पति से सिर्फ 400 रुपये चाहती हैं. लेकिन नहीं मिलने पर सबकुछ भूल बच्चों की मां बनकर ही फिर पति के पास पहुंचती हैं.
  4. चौथा फेज: जहां हर दीवार पर शाह बानो को गद्दार करार दिया जाता है, पर यहां भी वो रुकती नहीं है. पति के सामने खड़ी एक अनपढ़ महिला जरूर है, पर वो पति से बेहतर कुरान को समझती हैं. यहां एक सीन आता है, जब वो अपने तरीके से जज के सामने बात रखने की कोशिश करती हैं. यामी गौतम के चेहरे पर वो दर्द, वो तकलीफ और न कह पाने की परेशानी जैसे दिखती हैं, वो एकदम रियल है. जहां वो अपने लोगों के बीच भी खुद को साबित करती रह जाती है. साथ ही उनके जीवन में पिता का कितना अहम किरदार रहा, यह कहानी बयां करती है.
  5. पांचवां फेज: जब यामी गौतम शाह बानो बनकर सुप्रीम कोर्ट में अपनी बात रखती है. माय लॉर्ड्स, जज और क्या-क्या… वो कुरान जानती है, यह हिस्सा ही क्लाइमैक्स का बेस्ट पार्ट है. क्योंकि उसने जो कुछ समझा खुद समझा. यामी गौतम ने शाह बानो की तस्वीर को बड़े पर्दे पर बखूबी उतारा है. ऐसा इसलिए हो पाया, क्योंकि उनकी एक्टिंग में वो बात थी, जिसके आगे इमरान हाशमी भी कम नजर आए. जबकि वो कहीं भी कम नहीं थे, बस यामी के आगे कम दिखे.
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