Vedant Samachar

सुम्बुल तौकीर खान ने टीवी की पारंपरिक धारणा तोड़ी: सोनी सब का ‘इत्ती सी खुशी’ पेश करता है प्रेम और त्याग की एक नई, साहसिक परिभाषा

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मुंबई, 05 नवंबर, 2025। टेलीविजन पर लंबे समय से दिखाई जाने वाली ‘हमेशा त्याग करने वाली नारी’ की छवि को तोड़ते हुए, सोनी सब का चर्चित शो ‘इत्ती सी खुशी’ अपनी नायिका अन्विता (सुम्बुल तौकीर खान) के माध्यम से एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत कर रहा है — एक ऐसी महिला की कहानी जो परंपराओं को चुनौती देने का साहस रखती है। जहां आमतौर पर टीवी की नायिकाएं अपने प्रियजनों के लिए हर कष्ट सहने और त्याग करने में ही महानता समझती हैं, वहीं अन्विता दर्दनाक परिस्थिति में खड़े होकर खुद के लिए खड़े होने का साहस दिखाती है।

पारंपरिक नायिकाओं से अलग, जो अपनों को बचाने के लिए किसी भी हद तक चली जाती हैं, अन्विता तब भी अपने अस्तित्व को प्राथमिकता देती है जब मामला उसके खुद के परिवार का हो। उसका निर्णय स्वार्थ से नहीं, बल्कि अपने छोटे भाई-बहनों की भलाई के लिए अपनी सेहत और स्थिरता को बनाए रखने की सोच से प्रेरित है।

जब उसके पिता सुहास (वरुण बडोला) को लिवर सिरोसिस का पता चलता है और उन्हें तुरंत ट्रांसप्लांट की ज़रूरत होती है, तब अन्विता को पता चलता है कि उसका लिवर मैच करता है। लेकिन तुरंत फैसला लेने के बजाय, वह ठहरकर अपने परिवार के भविष्य के बारे में सोचती है — खासकर अपने छोटे भाई-बहनों के बारे में, जो पूरी तरह उस पर निर्भर हैं।

अपना लिवर दान न करने का उसका फैसला स्वार्थी नहीं, बल्कि गहरी समझ और दूरदृष्टि का प्रतीक है। अन्विता पल भर की भावना में नहीं, बल्कि पूरे परिवार के लंबे भविष्य को ध्यान में रखकर निर्णय लेती है। वह समझती है कि उसकी सेहत और मौजूदगी उसके परिवार की स्थिरता के लिए कितनी ज़रूरी है। हर परिणाम को सोच-समझकर तौलने का उसका तरीका आज की आधुनिक और यथार्थवादी प्रेम और जिम्मेदारी की समझ को दर्शाता है।

अपने भाई-बहनों की सुरक्षा चुनकर, और एक जीवन की बजाय कई जीवनों को संतुलन में रखकर अन्विता एक नई तरह की सशक्त नायिका बनकर उभरती है। उसकी कहानी दर्शकों के लिए न सिर्फ भावनात्मक बल्कि विचारोत्तेजक भी है — जो यह सवाल उठाती है कि क्या प्रेम का अर्थ हमेशा “त्याग” ही होता है?

प्रोमो यहां देखेंः

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आने वाले ट्रैक के बारे में बात करते हुए सुम्बुल कहती हैं, “ऐसा किरदार निभाना बहुत ताज़गीभरा अनुभव है, जो अपनी नायकता को आत्मसमर्पण में नहीं बल्कि अपने विश्वास पर अडिग रहने में परिभाषित करती है। अन्विता की यात्रा साहस और करुणा की है। वह अपने पिता और भाई-बहनों से बेहद प्यार करती है, और उसका निर्णय गहरे भावनात्मक संघर्ष से उपजा है। कभी-कभी अपने प्रियजनों की देखभाल का मतलब सबसे कठिन फैसले लेना होता है — वे फैसले जिन्हें सब समझ नहीं पाते। अन्विता की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वह अपने प्रेम और जिम्मेदारी में अडिग रहती है। वह हमें याद दिलाती है कि ताकत सिर्फ त्याग में नहीं, बल्कि स्पष्टता, देखभाल और दूरगामी भलाई के लिए सही निर्णय लेने के साहस में भी होती है।”

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