कोरबा, छत्तीसगढ़| भारत में हमेशा से कहा जाता है कि “जनसेवा ही ईश्वर सेवा है।” जब कोई व्यक्ति अपने व्यक्तिगत सपनों से आगे बढ़कर समाज और मानवता की सेवा में अपना जीवन समर्पित करता है, तो वह न केवल स्वयं के लिए बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा बन जाता है। कोरबा जिले के छोटे से गाँव फरसवानी में जन्मे राकेश श्रीवास आज उसी प्रेरणा के प्रतीक बन चुके हैं। गरीबी से निकलकर समाज सेवा के पथ पर चलने वाले राकेश ने हाल ही में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर ऐसी उपलब्धि हासिल की है, जिससे न केवल कोरबा, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ और भारत देश को गर्व महसूस हो रहा है।
आयोजन का भव्य स्वरूप
नई दिल्ली के भारत मंडपम में 21 से 24 सितंबर 2025 तक “नेशनल इंटीग्रेटेड फोरम ऑफ आर्टिस्ट्स एंड एक्टिविस्ट्स (NIFA)” द्वारा सिल्वर जुबली उत्सव का आयोजन किया गया। इस आयोजन की विशेषता यह रही कि इसमें देशभर के लगभग 700 जिलों से समाजसेवी संस्थाओं और कलाकारों ने शिरकत की।
निफा फाउंडेशन के राष्ट्रीय संस्थापक प्रतिपाल सिंह (पन्नू), राष्ट्रीय अध्यक्ष शेट्टी और प्रियंका बिसा के नेतृत्व में आयोजित इस कार्यक्रम ने समाज सेवा और कला को एक साथ जोड़ते हुए नई ऊँचाइयाँ दीं।
इस महोत्सव का उद्घाटन एक भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम से हुआ, जिसमें भारतीय परंपरा और विविधता की झलक देखने को मिली। यही नहीं, जापान, मॉरीशस, इंग्लैंड और भारत के प्रतिनिधियों की मौजूदगी ने इसे अंतर्राष्ट्रीय महत्व प्रदान किया।
राकेश श्रीवास को मिला राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सम्मान
इस मंच पर कोरबा जिले के निःस्वार्थ सेवा संस्थान के अध्यक्ष राकेश श्रीवास को सम्मानित किया गया। उन्हें न केवल नेशनल अवार्ड और अंतर्राष्ट्रीय प्रमाणपत्र दिया गया बल्कि इंग्लैंड की ओर से वल्र्ड रिकॉर्ड ऑफ एक्सीलेंस और निफा फाउंडेशन की ओर से यंग कम्यूनिटी चैंपियन अवार्ड भी प्रदान किया गया।
इंग्लैंड के राष्ट्रपति हेनरी आर. ने भारत के समाजसेवियों के लिए संदेश भेजा और उनके प्रतिनिधियों ने राकेश श्रीवास को यह सम्मान प्रदान किया। इस अवसर पर मॉरीशस के राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में उनके प्रतिनिधि उपस्थित रहे।
यह सम्मान राकेश के लिए सिर्फ एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं बल्कि उस निःस्वार्थ सेवा संस्थान और उसके हर सदस्य के अथक प्रयासों की पहचान है, जिन्होंने वर्षों से समाजसेवा को ही अपना जीवन समर्पित किया है।
गरीब परिवार से सेवा की ओर
राकेश श्रीवास का जीवन किसी प्रेरणादायक कहानी से कम नहीं। एक गरीब परिवार में जन्मे राकेश ने बचपन में सेना में जाकर देश की सेवा करने का सपना देखा था। लेकिन किस्मत ने उन्हें एक और रास्ता दिखाया—“जनसेवा।”
उन्होंने यह ठान लिया कि “अगर सेना में जाकर देश की सेवा संभव नहीं तो समाज की सेवा ही सच्ची देश सेवा है।”
इसी सोच के साथ राकेश ने अपने गाँव से शुरुआत की और आज राष्ट्रीय स्तर तक पहुँच गए।
रक्तदान से शुरू हुई यात्रा
समाजसेवा का पहला कदम राकेश ने रक्तदान से शुरू किया अब तक वह 29 बार रक्तदान कर चुके हैं।मृत्यु के बाद देहदान का संकल्प लिया है।थैलेसीमिया और सिकलिंग रोगियों, गर्भवती महिलाओं और दुर्घटनाग्रस्त मरीजों को निःशुल्क रक्त उपलब्ध करवाते हैं।
उनकी संस्था निःस्वार्थ सेवा संस्थान ने न केवल मरीजों की जान बचाई है बल्कि रक्तदान को समाज में एक आंदोलन बना दिया है।
गौसेवा और पर्यावरण संरक्षण
रक्तदान के साथ-साथ राकेश और उनकी संस्था गौसेवा, घायल पशुओं की प्राथमिक उपचार व्यवस्था, वृक्षारोपण और पर्यावरण संरक्षण जैसे कार्यों में भी सक्रिय हैं।घायल गायों और जानवरों का उपचार,नियमित वृक्षारोपण अभियान,स्वच्छता अभियान में भागीदारी
अंतर्राष्ट्रीय मान्यता : वर्ल्ड रिकॉर्ड ऑफ एक्सीलेंस
इंग्लैंड की ओर से मिला वल्र्ड रिकॉर्ड ऑफ एक्सीलेंस यह दर्शाता है कि राकेश का काम अब केवल भारत तक सीमित नहीं रहा। उनकी निःस्वार्थ सेवा ने अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भी पहचान बनाई है।विदेशी प्रतिनिधियों ने माना कि ऐसे समाजसेवी ही दुनिया में वास्तविक बदलाव लाते हैं।
राकेश श्रीवास का आभार
सम्मान मिलने के बाद राकेश ने कहा—
“यह पुरस्कार केवल मेरा नहीं, बल्कि निःस्वार्थ सेवा संस्थान के हर उस सदस्य का है, जो रक्तदान, गौसेवा, वृक्षारोपण और स्वच्छता जैसे हर अभियान में मेरे साथ खड़ा रहता है। यह सम्मान हमारे पूरे समाजसेवी परिवार का है।”



