Vedant Samachar

जापानी आक्रमण के खिलाफ आम चीनी लोगों का असाधारण प्रतिरोध

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कुछ कहानियाँ इतनी दर्दनाक होती हैं कि उन्हें सुनाना भी मुश्किल होता है। कुछ जख्म इतने गहरे होते हैं कि समय भी उन्हें भर नहीं पाता। आज से 80 साल पहले, दुनिया के एक हिस्से में इंसानों पर ऐसी हैवानियत हुई थी कि उसे सुनकर आज भी रूह कांप जाती है। यह कहानी है चीन की, उस समय की जब जापान का फासीवाद और क्रूरता अपनी हदें पार कर गए थे। यह इतिहास सिर्फ तारीखों का लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि उन लोगों की कहानियाँ हैं जिन्होंने इस संघर्ष को जिया और मानवता के सबसे काले दौर का सामना किया।

जापानी आक्रमण का आरम्भ

जुलाई 1937 में, जापान ने चीन पर हमला कर दिया, जिसने द्वितीय विश्व युद्ध का एशियाई मोर्चा शुरू किया। जापानी सेना अपने आधुनिक हथियारों और मजबूत सैन्य शक्ति के साथ आगे बढ़ी, जबकि चीन के पास इतने उन्नत साधन नहीं थे। जापानी सेना ने चीन के बड़े शहरों को एक के बाद एक जीतना शुरू कर दिया, जिनमें शांगहाई, पेकिंग (आज का पेइचिंग), और नानचिंग शामिल थे। लेकिन इन जीतों के पीछे एक भयानक और अमानवीय सच्चाई छिपी हुई थी, जो दुनिया को चौंकाने वाली थी। जापानी सेना ने सिर्फ शहरों पर कब्जा नहीं किया, बल्कि वे मानवता की सारी सीमाओं को पार कर गए।

नानचिंग नरसंहार की भयावहता

दिसंबर 1937 में, जब जापानी सेना चीन की तत्कालीन राजधानी नानचिंग में दाखिल हुई, तो वहाँ की गलियाँ कुछ ही दिनों में खून से लाल हो गईं। इतिहासकारों ने इसे मानवता के माथे पर एक काला दाग माना है, जिसे ‘नानचिंग नरसंहार’ या ‘द रेप ऑफ नानकिंग’ के नाम से जाना जाता है। जापानी सैनिकों ने शहर में बड़े पैमाने पर सामूहिक हत्याएं और सामूहिक बलात्कार किए। अनुमान है कि 2 लाख से 3 लाख बेकसूर चीनी नागरिकों और निहत्थे सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया गया। लोगों को मशीन गन से गोली मारी गई, जिंदा दफनाया गया और तलवारों से काट दिया गया।

इस बर्बरता के पैमाने को सिर्फ संख्याओं से समझना मुश्किल है। वहाँ एक 8 साल की बच्ची थी। जापानी सैनिक उसके घर में घुस आए और 13 में से 11 लोगों को मार डाला—उसके माता-पिता, दादा-दादी, भाई-बहन और पड़ोसी। सिर्फ वह और उसकी 4 साल की छोटी बहन जिंदा बचीं, जो उस भयावह दिन की एकमात्र गवाह बनीं। यह व्यक्तिगत कहानी दिखाती है कि युद्ध के दौरान कैसे आम परिवारों को क्रूरता का सामना करना पड़ा।

नानचिंग में 20,000 से अधिक महिलाओं और लड़कियों का सामूहिक बलात्कार किया गया। विदेशी मीडिया की रिपोर्टों में 12 साल की बच्चियों के साथ भी इस बर्बरता का उल्लेख किया गया है, जिन्हें इस अमानवीय हिंसा का शिकार बनाया गया। यह अत्याचार सिर्फ सैन्य जीत के लिए नहीं थे, बल्कि क्रूरता के ऐसे उदाहरण थे जो इंसानियत को शर्मसार कर देते हैं।

यूनिट 731: एक गुप्त प्रयोगशाला

जापानी क्रूरता की कहानी सिर्फ युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं थी। चीन के हारबिन शहर में एक और जगह थी, जहाँ इंसानियत को हमेशा के लिए दफन कर दिया गया। यह थी यूनिट 731, एक गुप्त बायोलॉजिकल और केमिकल लैब जिसे जापानी सेना ने बनाया था। इस लैब का उद्देश्य जापान के लिए बायोलॉजिकल और केमिकल हथियार बनाना और उनका परीक्षण करना था। लेकिन यह परीक्षण जानवरों पर नहीं, बल्कि जिंदा इंसानों पर किए जाते थे, जिन्हें जापानी सैनिक ‘मारुस’ या ‘लॉग्स’ कहते थे। अनुमान है कि 3,000 से अधिक लोगों को इन प्रयोगों में मार दिया गया था, जिनमें से अधिकांश चीनी और कोरियाई थे। इन भयानक प्रयोगों में कोई भी जीवित नहीं बच पाया।

अमानवीय और दिल दहला देने वाले प्रयोग

यूनिट 731 में किए गए प्रयोग मानवता की कल्पना से परे थे। कैदियों को बर्फीले पहाड़ों पर बिना कपड़ों के खड़ा कर दिया जाता था, जहाँ तापमान -30 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता था। फिर उन पर बाल्टियों में ठंडा पानी डाला जाता, जब तक उनका शरीर पत्थर की तरह जम न जाए। यह सिर्फ यह देखने के लिए किया जाता था कि इंसान कितनी ठंड बर्दाश्त कर सकता है।

जापान का मानना था कि युद्ध में अपने डॉक्टरों को बेहतर प्रशिक्षण देकर वे अपने नुकसान को कम कर सकते हैं। इसके लिए, जिंदा कैदियों को बिना किसी बेहोशी की दवा के, उनके हाथ, पैर और गर्दन को एक-एक करके काट दिया जाता था। कई कैदियों को हैजा, टाइफाइड और प्लेग जैसी बीमारियों से संक्रमित किया जाता था ताकि वायरस के असर को देखा जा सके।

कुछ कैदियों को एक प्रेशर चेंबर में डाला जाता था, जहाँ हवा का दबाव इतना बढ़ा दिया जाता था कि उनकी आँखें फटकर बाहर आ जाती थीं और उनकी आंतरिक नसें फट जाती थीं।

इन अमानवीय प्रयोगों को सालों तक दुनिया से छिपाकर रखा गया। युद्ध के बाद, यूनिट 731 के कमांडर, शिरी इशी और उसके साथी डॉक्टरों को अमेरिकी अधिकारियों ने उनके शोध डेटा के बदले में युद्ध अपराधों से छूट दे दी। जबकि नाज़ी डॉक्टरों को उनके अपराधों के लिए नूर्नबर्ग में दंडित किया गया, यूनिट 731 के इन डॉक्टरों को कभी भी न्याय का सामना नहीं करना पड़ा। यह इस बात को दर्शाता है कि युद्ध की क्रूरता के लिए जवाबदेही हमेशा सुनिश्चित नहीं की गई, जिसने इस भयानक अध्याय के दर्द को और गहरा कर दिया।

गुरिल्ला युद्ध का उदय

जापानी सेना ने शहरों पर तो कब्जा कर लिया, लेकिन वे चीन की आत्मा को नहीं जीत पाए। जब चीन की पारंपरिक सेना पीछे हटी, तो लाखों आम लोगों ने गुरिल्ला युद्ध का मोर्चा संभाला। यह युद्ध ‘मारो और भाग जाओ’ की रणनीति पर आधारित था। उनके पास आधुनिक हथियार नहीं थे, कभी-कभी तो साधारण किसान अपने पारंपरिक औजारों और पुराने बंदूकों से ही लड़ते थे। लेकिन उनका सबसे बड़ा हथियार था उनका दृढ़ संकल्प और अपनी जमीन का ज्ञान।

इन छापामार सैनिकों ने जापानियों की आपूर्ति लाइनों को काटा, छोटे-छोटे हमले करके उन्हें परेशान किया और दुश्मन को कभी चैन से नहीं रहने दिया। इस रणनीति ने जापानी सेना के एक बड़े हिस्से को चीन में ही व्यस्त रखा, जिससे मित्र राष्ट्रों को प्रशांत क्षेत्र में अपनी लड़ाई लड़ने का मौका मिला। यह प्रतिरोध केवल सैन्य नहीं था, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक और सामाजिक आंदोलन का हिस्सा था, जो चीन के लोगों की अटूट हिम्मत को दिखाता है।

‘800 बहादुरों’ की कहानी

1937 में, शंघाई की लड़ाई के दौरान, सिर्फ 400 चीनी सैनिक एक गोदाम में छिप गए। उन्होंने दुनिया को यह दिखाने का फैसला किया कि चीनी हार नहीं मानेंगे। जापानी सेना ने यह सोचा कि वहाँ 800 सैनिक हैं, और इस तरह वे ‘800 बहादुरों’ के नाम से मशहूर हो गए। दुनिया भर के हजारों पत्रकारों और नागरिकों ने नदी के पार से इस ऐतिहासिक लड़ाई को देखा।

एक 22 साल की बहादुर लड़की, यांग हुईमिन अपनी जान जोखिम में डालकर उनके लिए एक राष्ट्रीय ध्वज लेकर गई। अगले दिन, जब वह झंडा गोदाम के ऊपर फहराया गया, तो नदी के पार हजारों चीनी नागरिक रो पड़े और तालियाँ बजाने लगे। वह सिर्फ एक झंडा नहीं था, वह आशा और प्रतिरोध का प्रतीक था, जिसने पूरे चीन के मनोबल को एक नई उड़ान दी। यह कहानी इस बात का प्रमाण है कि भले ही संख्या कम हो, लेकिन साहस और दृढ़ संकल्प से बड़ी से बड़ी ताकत को रोका जा सकता है।

नागरिकों का प्रतिरोध

यह लड़ाई सिर्फ सैनिकों की नहीं थी। गाँवों में किसान जापानियों से छिप गए, उन्हें भोजन देने से इनकार कर दिया और दुश्मन के रास्तों को मुश्किल बना दिया। जब 1942 में अमेरिकी पायलटों का एक समूह चीन में दुर्घटनाग्रस्त हो गया, तो चीन के किसानों ने अपनी जान जोखिम में डालकर उन्हें जापानी सेना से बचाया और सुरक्षित पहुँचाया। यह घटना बताती है कि यह लड़ाई केवल भू-भाग की नहीं, बल्कि दोस्ती और इंसानियत की भी थी, जिसमें आम नागरिकों ने भी अपनी बहादुरी से महत्वपूर्ण योगदान दिया।

विजय और भविष्य का सबक

1945 में, जब दुनिया ने देखा कि फासीवाद की ताकतें घुटनों पर आ गई हैं, तो चीन में भी विजय की सुबह हुई। जापान ने आखिरकार आत्मसमर्पण कर दिया और चीन की सदियों पुरानी सभ्यता को बचाने वाले इस युद्ध का अंत हुआ। यह जीत सिर्फ अमेरिका या ब्रिटेन की नहीं थी। कई इतिहासकार बताते हैं कि चीन का प्रतिरोध फासीवाद-विरोधी वैश्विक युद्ध का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था, जिसकी भूमिका को अक्सर पश्चिमी इतिहास में कम आँका जाता है। चीन ने 1937 से 1941 तक जापान से अकेले लड़ाई लड़ी, जिससे जापान की एक बड़ी सैन्य शक्ति चीन में ही फँसी रही और मित्र राष्ट्रों को प्रशांत क्षेत्र में लड़ने का मौका मिला।

आज, जब पूरी दुनिया उस महान विजय की 80वीं वर्षगांठ मना रहे हैं, तो यह सिर्फ एक ऐतिहासिक घटना को याद करने का समय नहीं है। यह उन 3.5 करोड़ से अधिक लोगों को श्रद्धांजलि है जिन्होंने इस संघर्ष में अपनी जान गंवाई। यह हमें याद दिलाता है कि शांति और न्याय कभी भी मुफ्त नहीं मिलते। वे बलिदान, साहस और दृढ़ संकल्प से अर्जित होते हैं। इतिहास हमें सिखाता है कि युद्ध से सिर्फ विनाश होता है।

यही कारण है कि हमें शांति, एकता और सहयोग के मूल्यों को हमेशा याद रखना चाहिए और आतंकवाद, नस्लीय संघर्ष और भू-राजनीतिक तनाव जैसी चुनौतियों का सामना करने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना चाहिए। यह कहानी हमें सिखाती है कि चाहे मुश्किलें कितनी भी बड़ी क्यों न हों, इंसानियत और हिम्मत हमेशा बुराई पर जीत हासिल करती है।

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