रायपुर,13अगस्त (वेदांत समाचार) । जागृति हम सबको विकसित करना है। अलार्म बज सकता है, लेकिन जागना हमको पड़ेगा। अलार्म जगा नहीं सकता। दूसरा व्यक्ति निमित्त तो बन सकता है, लेकिन कार्य तभी होगा जब भीतर की चेतना जागृत होगी। चाहे सत्संग में आएं, चाहे सतगुरु के पास जाएं, चाहे परमात्मा के पास जाएं, इन सब पर विश्वास जरूर करना है।
इनके भरोसे पर नहीं रहना है। इनका सदुपयोग करके अपने आप को जागृत करना है। चेतना जागृत करना है। तभी हम प्रमाद से जागेंगे। आत्मा जाग गई तो सबकुछ जाग जाएगा। आत्म तत्व को जगाना है। ये बातें मंगलवार को टेगौर नगर पटवा भवन में जारी चातुर्मासिक प्रवचनमाला में परम पूज्य उपाध्याय भगवंत युवा मनीषी मनीष सागरजी महाराज ने कही। उपाध्याय भगवंत ने कहा कि मन में जागरण लाना है। अपने आनंद में रहना है। चाहे परिस्थितियां अनुकूल से प्रतिकूल हो जाए।
स्वयं को सुखी करने की ताकत बढ़ाना है। सुख को ऐसे बढ़ाना है कि फिर हम दुखी ना हो पाएं। संसार की उलझन से अपने आपको मजबूत करने की जागृति बढ़ाना है। इसके लिए सबसे पहला स्टेप है पाप से बचाना। दूसरा स्टेप पुण्य से नहीं चूकना। तीसरा स्टेप समता में रहना। चौथा स्टेप समता में अखंड रहना। उपाध्याय भगवंत ने कहा कि आपको अभ्यास करना होगा कि हमेशा जागृत रहो। आप कितना भी अच्छा कार्य कर लो। रिकॉर्ड क्यों ना तोड़ लो। बेफिक्र मत रहो।
मैं अच्छा हो गया,मैं अच्छा ही रहूंगा,यह मत सोचो। बेहतर होने के बाद भी हर पल जागृत रहना ही पड़ेगा। अच्छा कपड़ा पहनने की भावना होती है। देख कर बैठने की भावना भी होनी चाहिए। इससे जीव हिंसा के पाप से बचा जा सकता है। ऐसे ही बोलते समय जागृत रहे। आपकी बातों से कहीं किसी को बुरा मत लग जाए। उपाध्याय भगवंत ने कहा कि किसी को दुखी करना अधर्म है। आत्महत्या करने वाला खुद को दुखी करता है। यह अधर्म है। हत्या करने वाला दूसरे को दुखी करता है। यह भी अधर्म है।
परमात्मा ने मार्ग बताया है आप भी दुखी ना हो और दूसरे को भी दुखी ना करो। इसकी चेतना जागृत करना है। पाप से बचना कठिन लगे तो हमेशा अच्छे निमित्त चुनो। बुरे निमित्त ना चुनो। हमेशा शुभ निमित्त में रहना चाहिए। उपाध्याय भगवंत ने कहा कि शुभ निमित्त में रहकर शुभ प्रवृत्ति में आना शुरू होगा। शुभ प्रवृत्ति से शुभ भाव में आने की कोशिश करना होगा। शुभ निमित्त से शुभ प्रवृत्ति में आओगे। शुभ प्रवृत्ति से शुभ भाव में आओगे। शुभ भावों से तत्वज्ञान में आगोगे। तत्वज्ञान में आकर स्व व पर का भेद होता है। व्यक्ति स्व व पर का भेद पता कर चिंतन करते-करते अपनी मान्यताओं को सुधार लेता है। शुभ मान्यता होगी,शुद्ध मान्यता होगी तो संयमित होते-होते अखंड संयम,अखंड जागृति में पहुंचकर प्रमाद खत्म हो जाता है। ऐसे हम अपना लेवल बढ़ा सकते हैं।



