मुंबई : सिनेमा अक्सर मनोरंजन का जरिया होता है, लेकिन कुछ फिल्में हमें आईना दिखाती हैं. ‘धड़क 2’ उन्हीं में से एक है. अगर दलित होता तो बच जाता, कोई छूता तक नहीं…इस फिल्म का ये शुरुआती डायलॉग ही सदियों के दर्द को समेट लेता है. ये लाइन सुनते ही सीधे दिल पर चोट लगती है. लेकिन क्या फिल्म इस चोट को बरकरार रख पाती है? क्या ये सच में उस दर्द को महसूस करवा पाती है, जिसे सदियों से एक बड़े तबके ने झेला है? शायद नहीं. और इसी ‘शायद’ में धड़क 2 की पूरी कहानी छिपी है. ये एक ऐसी फिल्म है जो बोलना तो बहुत कुछ चाहती है, लेकिन कई जगह अपनी ही आवाज में खो जाती है.
कहानी
ये कहानी है नीलेश (सिद्धांत चतुर्वेदी) और विधि (तृप्ति डिमरी) की. दोनों एक ही लॉ कॉलेज में पढ़ते हैं, एक ही क्लास में बैठते हैं. लेकिन उनके बीच एक ऐसी गहरी खाई है जो दिखती नहीं, पर हर पल महसूस होती है. इस खाई के चलते ही नीलेश को अपना उपनाम ‘अहिरवार’ छिपाकर रखना पड़ता है, क्योंकि ये उसकी ‘निचली जाति’ की पहचान है. वहीं विधि एक ‘ऊंची जाति’ के ब्राह्मण परिवार से है, जिसे कभी अपनी जाति के बारे में सोचना भी नहीं पड़ा.
धड़क 2 एक बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दे पर बनी है. ये फिल्म हमें बताती है कि कैसे आज भी कुछ लोग अपनी जाति के कारण लगातार अपमानित होते हैं, उन पर गंदगी फेंकी जाती है और उन्हें मारा-पीटा जाता है. नीलेश का किरदार धीरे-धीरे इस अपमान के खिलाफ खड़ा होता है. उसका ‘मारो या मरो’ का नारा उसकी मजबूरी बन जाता है. इस संघर्ष में उसकी मां और कॉलेज के प्रिंसिपल का साथ उसके हौसले को और बढ़ा देता है.
कैसी है ये फिल्म?
ये फिल्म तमिलनाडु की सुपरहिट ‘Pariyerum Perumal’ से प्रेरित है. फिल्म में जब नीलेश अपनी दुनिया विधि को दिखाता है — कैसे उसकी मां को अपनी आवाज उठाने पर पुलिस वाला थप्पड़ जड़ देता है, कैसे पानी का इस्तेमाल करने की वजह से उसके कुत्ते को बेरहमी से मारा जाता है, तब फिल्म कुछ पल के लिए असली और गहरी लगती है. रही बात नीलेश विधि के प्यार की, तो इन दोनों के बीच प्यार तो पनपता है, लेकिन ये प्यार भी कहीं-कहीं जगह पर थोपा हुआ सा लगता है. धड़क 2 की कहानी सिर्फ दो प्रेमियों की नहीं, बल्कि उस पूरे समाज की है जो आज भी जाति की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है.
धड़क 2 कई गंभीर मुद्दों को उठाती है – जातिवाद, वर्गवाद, लिंग पहचान और नारीवाद. इसमें रोहित वेमुला जैसे मामले की भी झलक मिलती है, जब एक छात्र की आत्महत्या पर बात की जाती है. ये फिल्म हमें ये भी सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम भी विधि की तरह ही अपनी आंखों पर पट्टी बांधे बैठे हैं? जब नीलेश विधि से पूछता है, ‘क्या तुम नहीं देख सकती कि यहां क्या हो रहा है?’, तो लगता है ये सवाल सिर्फ विधि से नहीं, बल्कि हम सभी से है.
डायरेक्शन और एक्टिंग
शाजिया इकबाल ने एक गंभीर विषय को चुना है. उनका डायरेक्शन कई जगह दमदार है, खासकर जब वो नीलेश के दर्द को दिखाने की कोशिश करती हैं. हालांकि, कई बार लगता है कि किरदार सिर्फ ज्ञान दे रहे हैं और अचानक कहानी का दर्शकों से कनेक्शन ही टूट जाता है.
सिद्धांत चतुर्वेदी और तृप्ति डिमरी ने अच्छा काम किया है. तृप्ति अपने किरदार में ज्यादा प्रभावी लगती हैं, खासकर उन दृश्यों में जहां वो अपनी ही सोच और समाज के बीच फंसी हुई दिखती हैं. सिद्धांत ने भी नीलेश के दर्द और गुस्से को अच्छे से दर्शाया है. अनुभा फतेहपुरा और विपिन शर्मा जैसे सहायक कलाकारों ने भी अपने छोटे-छोटे किरदारों से जान भर दी है. लेकिन इस फिल्म में कुछ कमियां भी हैं.
क्या हैं खामियां
धड़क 2 की सबसे बड़ी कमी यही है कि ये फिल्म उन मुद्दों की गहराई में नहीं उतर पाती, जिन्हें ये छूने की कोशिश करती है. मूल तमिल फ़िल्म Pariyerum Perumal में जो दृश्य दिल दहला देने वाले थे, यहां वे बस कुछ पलों के लिए आकर चले जाते हैं. जहां ओरिजिनल तमिल फिल्म बिना किसी लाग-लपेट के रॉ और खुरदुरी सच्चाई दिखाती थी, वहीं धर्मा प्रोडक्शन की फिल्म उस सच्चाई को कुछ जगह फिल्टर और पॉलिश करके हमारे सामने रखती है.
ये वही समस्या है जो सैराट और धड़क में थी. सैराट और पेरियरुम पेरुमल जैसी फिल्में अपनी रॉनेस (कच्चेपन) के लिए जानी जाती हैं, जहां समाज की कड़वी हकीकत को बिना किसी तामझाम के दिखाया जाता है. लेकिन धड़क हो या धड़क 2, उसी दर्द को एनहांस करके हमारे सामने पेश करती हैं. यही वजह है कि धड़क 2 ओरिजिनल फिल्म के मुकाबले कहीं ज़्यादा कमज़ोर लगती है. भले ही यह धड़क से बेहतर हो, लेकिन ये सैराट और पेरियरुम पेरुमल के स्तर तक पहुंचने में नाकाम रहती है. फिल्म हमें अपनी जमीन से जुड़ी दुनिया तो दिखाती है, लेकिन उस दुनिया के उन चेहरों को धुंधला छोड़ देती है जिन्हें हमें करीब से देखना.
देखें या न देखे?
अगर आप एक ऐसी फ़िल्म देखना चाहते हैं जो समाज के सबसे बड़े सच से आपका सामना करवाती है, तो आपको ये फिल्म जरूर देखनी चाहिए. ये 2018 की ‘धड़क’ से कई गुना बेहतर और ज्यादा जरूरी है. ये भले ही उतनी तीखी ना हो जितनी होनी चाहिए थी, पर ये फिर भी एक महत्वपूर्ण फिल्म है. ये एक ऐसी दस्तक है, जो भले ही दरवाजे को हिला ना पाए, पर उसकी मौजूदगी का एहसास जरूर करवा जाती है.



