Vedant Samachar

5 सालों में 50% बढ़ गई हार्ट की दवाओं की डिमांड, क्यों बढ़ रही ये बीमारी

Vedant Samachar
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पिछले 5 वर्षों में भारत में कार्डियक मेडिकेशन यानी हृदय संबंधी दवाओं की मांग में 50% तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार यह बढ़ोतरी सिर्फ एक हेल्थ ट्रेंड नहीं बल्कि एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चेतावनी है. तेजी से बदलती जीवनशैली, बढ़ता तनाव, खान-पान की गड़बड़ी और शारीरिक गतिविधियों की कमी ने युवाओं से लेकर बुज़ुर्गों तक में दिल की बीमारियों को सामान्य बना दिया है.

अपोलो अस्पताल में कार्डियोलॉजी विभाग में डॉ. वरुण बंसल के मुताबिक,पहले हृदय रोग आमतौर पर 50-60 साल की उम्र के बाद होते थे, लेकिन अब 25 से 40 वर्ष के लोगों में भी हाई ब्लड प्रेशर, हाई कोलेस्ट्रॉल और हार्ट अटैक जैसे केस बढ़ रहे हैं. कोविड महामारी के बाद तो स्थिति और खराब हुई है. क्योंकि कई मरीजों में संक्रमण के बाद पोस्ट-कोविड कार्डियक जटिलताएं देखी गईं, जिसके लिए लंबे समय तक दवा चलती है. यही वजह है कि दवाओं की खपत में तेज़ उछाल देखा गया.

120/80 mmHg अब अलर्ट जोन

इसके अलावा हाल के वर्षों में डॉक्टरों ने भी रोगियों में हृदय रोग के जोखिम को देखते हुए प्रिवेंशन (रोकथाम) के तौर पर पहले से ही कार्डियक दवाएं लिखनी शुरू कर दी हैं. पहले जहां 140/90 mmHg को हाइपरटेंशन माना जाता था, नई गाइडलाइंस के अनुसार अब 120/80 mmHg से ऊपर का ब्लड प्रेशर भी अलर्ट जोन में माना जाता है. जिससे पहले की तुलना में ज्यादा लोगों को दवा की जरूरत पड़ रही है. कार्डियक मेडिकेशन (हृदय संबंधी दवाओं) की डिमांड भारत में इतनी तेज़ी से क्यों बढ़ रही है, इसके पीछे कई गहरे और चिंताजनक कारण हैं-

1 दिल की बीमारियों का बढ़ता बोझ-

भारत में हर तीसरी मौत दिल की बीमारी के कारण हो रही है. दिल की बीमारियां अब सिर्फ बुज़ुर्गों तक सीमित नहीं रहीं बल्कि 25 से 40 वर्ष के युवाओं में भी तेजी से बढ़ रही हैं. इससे दवाओं की ज़रूरत भी बढ़ गई है.

2 लाइफस्टाइल में गिरावट-

आजकल की बैठकर काम करने वाली जीवनशैली, फास्ट फूड, नींद की कमी और बढ़ता तनाव हाइपरटेंशन (उच्च रक्तचाप), कोलेस्ट्रॉल और ओबेसिटी जैसे फैक्टर्स को बढ़ा रहे हैं जो हार्ट डिजीज के बड़े कारण हैं.

3 बेहतर डायग्नोसिस और अवेयरनेस-

अब पहले से ज्यादा लोग हेल्थ चेकअप करवाने लगे हैं और बीमारियों का जल्दी पता चल जाता है. इससे मरीजों को जल्दी दवाएं शुरू करनी पड़ती हैं. मेडिकल सुविधा और टेस्टिंग अब गांवों तक भी पहुंच रही है.

4 डॉक्टर्स की प्रैक्टिस में बदलाव-

अब कार्डियोलॉजिस्ट और जनरल फिजिशियन दिल की बीमारी के जोखिम को लेकर ज्यादा सतर्क हैं. वे प्रिवेंशन (बचाव) के लिए भी दवाएं जल्दी शुरू कर देते हैं ताकि रिस्क को कम किया जा सके.

5 वायरल संक्रमण और पोस्ट-कोविड असर-

कोविड-19 के बाद कई मरीजों में हार्ट से जुड़ी जटिलताएं देखी गईं, जिससे एंटी-क्लॉटिंग और हार्ट मेडिकेशन की मांग और बढ़ गई.

Early Detection और बढ़ती जागरूकता

बढ़ती जागरूकता और हेल्थ चेकअप की आसान उपलब्धता ने भी डायग्नोसिस को बढ़ाया है. जहां पहले लोग हार्ट की तकलीफ को नजरअंदाज कर देते थे, अब छोटी शिकायत पर भी ECG, BP, कोलेस्ट्रॉल की जांच होने लगी है. इससे मरीजों को जल्दी इलाज और दवा की जरूरत पड़ती है जो एक अच्छी बात भी है क्योंकि early detection से हार्ट अटैक और स्ट्रोक जैसी स्थितियों से बचा जा सकता है.

लाइफस्टाइल में बदलाव जरुरी

लेकिन यह ट्रेंड यह भी बताता है कि अगर लोगों ने अपनी लाइफस्टाइल नहीं बदली- जैसे कि संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, स्ट्रेस मैनेजमेंट और पर्याप्त नींद. तो हृदय रोग आने वाले सालों में और ज्यादा आम हो सकते हैं. इसलिए अब वक्त है कि लोग सिर्फ दवाओं पर निर्भर न रहें, बल्कि दिल को स्वस्थ रखने के लिए जागरूक जीवनशैली अपनाएं ताकि यह संकट एक हेल्थ इमरजेंसी न बन जाए.

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