आपातकाल का काला अध्याय जो भुलाए नहीं भूलता-विनोद सिन्हा
कोरबा lभारतीय जनतंत्र के प्रहरी जनप्रतिनिधि अपने दायित्व से विमुख हो जाए, अनैतिकता के दीवारों से घिर जाए ,निजी स्वार्थ के लिए निरंकुश शासन की ओर कार्य करने लगे तो समझ लीजिए उस देश और लोकतंत्र का क्या होगा ?
1973-74 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में बिहार में छात्र आंदोलन का शुभारंभ हुआ उसके पूर्व लोकनायक जय प्रकाश नारायण ने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को लोकतंत्र की मजबूती भारत की खुशहाली तथा आम जन समस्याओं को सर्वोपरि, गरीबी मिटाने हर क्षेत्र में विकास के लिए कार्य योजना बनाने के हेतु अनेक बार स्वयं या पत्रों के माध्यम से बाबू जयप्रकाश नारायण ने प्रयास किया प्रयास असफल होने पर एकाएक 1974 में बिहार में छात्र आंदोलन प्रारंभ हो गया , छात्र आंदोलन देखते-देखते पूरे देश में फैल रहा था इधर श्रीमती इंदिरा गांधी, जयप्रकाश बाबू के कार्यकलापों से तथा छात्र आंदोलन से परेशान थी, वहीं दूसरी ओर उनके निर्वाचन क्षेत्र रायबरेली से पराजित उम्मीदवार राजनारायण का इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनाव याचिका पर सुनवाई करते हुए तत्कालीन जज जगमोहन ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए श्रीमती इंदिरा गांधी के चुनाव को खारिज करते हुए 6 वर्षों तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया l
1974 में हम हाई स्कूल का विद्यार्थी थे हमने भी छात्र आंदोलन में शामिल होकर अपना योगदान देने लगे तब तक प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने चुनाव याचिका से परेशान होकर सत्ता हाथ से निकलते देख अपनी निजी स्वार्थ के चलते 25 जून 1975 को आधी रात में तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से मिलकर आपातकाल की घोषणा कर दी, आपातकाल की घोषणा होते ही इंदिरा सरकार द्वारा पहले से तैयार एजेंडा के अनुसार लोकतंत्र की गला घोटने वाले सभी आदेश लागू कर दिए गए l
लोकतांत्रिक व्यवस्था, मानव अधिकार, प्रेस की स्वतंत्रता व मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया और पूरे देश में भय का वातावरण पैदा कर श्रीमती इंदिरा गांधी व उनके पुत्र संजय गांधी ने लोकतंत्र को कुचल दिया l
आपातकाल का अध्याय काली रात जो भुलाए नहीं भूलता इसी दौरान 19 जुलाई 1975 को मुझे गिरफ्तार कर भारत रक्षा कानून के तहत विशेष केंद्रीय कारा भागलपुर में अवरुद्ध कर दिया गया, 13 माह तक जेल में अवरुद्ध था इस दौरान लग रहा था कि भारत में अब लोकतंत्र कभी नहीं आएगा फिर भी इंदिरा सरकार ने स्वयंसेवी संगठन, सामाजिक कार्यकर्ता व राजनेताओं तथा निर्दोष नागरिकों को जेल में डाला ताकि निराश होकर जेल से बाहर न निकले तथा उनमें कुछ कर गुजरने की क्षमता न हो ऐसा वातावरण बनाया गय
लेकिन ऐसा नहीं हुआ इंदिरा गांधी ने जब आपातकाल खत्म किया तो पूरे देश में इंदिरा सरकार के खिलाफ एक पक्षीय वातावरण के माध्यम से जनता ने कांग्रेस को जड़ मूल से उखाड़ फेंका लेकिन कांग्रेस विरोध से सत्ता प्राप्त करते ही हमारे ही नेताओं ने आपस में अपनी-अपनी डफली बजाने लगे जिससे जनता सरकार गिर गई वह भी भारतीय लोकतंत्र के लिए दुखदाई समय था l
आपातकाल के दौरान संजय गांधी ने चार सूत्री कार्यक्रम का आयोजन किया जिसमें प्रमुख रूप से परिवार कल्याण नियंत्रित करने के लिए नसबंदी व बंध्याकरण प्रमुख था देश के सभी कर्मचारियों को एक लक्ष्य दिया गया और उस लक्ष्य को पूरा नहीं करने पर वेतन रोकना, नौकरी से बर्खास्त करना आदि के चलते नौकरशाहों ने पूरे देश में जमकर तांडव मचाया जिनकी जरूरत नहीं थी नसबंदी य बंध्याकरण करने की उनका जबरन किया इतना ही नहीं कोई भी व्यक्ति सत्य बोलने से परहेज करते थे यानी चर्चा भय से नहीं करते थे की कहीं मुझे भी आपातकाल में अंदर न कर दिया जाएl
जिस तरह से आज पश्चिम बंगाल में सत्ता पर काबीज शासन द्वारा हमेशा के लिए सत्ता बरकरार रखने के लिए आम जनता को भयभीत कर जबरन मतदान केंद्रों में बोगस वोट गिराकर सरकार बना रही है, आज भी पश्चिम बंगाल में बंगाल सरकार के विपक्ष में कहीं भी सार्वजनिक स्थानों पर लोग चर्चा करने से डरते हैं क्योंकि चर्चा किया तो चाकू ,बम ,सोडा पानी से हमला और अंत में घर जलाकर मार डालना यह आज के समय में आम बात हो गई है ठीक उसी तरह आपातकाल के कार्यकाल में जनमानस को भयभीत कर यही स्थिति अपनाई गई थी
आज आपातकाल का 50 वी वर्षि पर हम वर्तमान समय में नागरिकों को खासकर, युवाओं व महिलाओं को हम सलाह देंगे की अब देश में आर्थिक क्रांति की जरूरत है आर्थिक क्रांति के माध्यम से आदिकाल से भारत सोने की चिड़िया रही है लेकिन आक्रांतों के कारण हमारी सहनशीलता के कारण सोने की चिड़िया भारत वंचित हो गए हैं पुनः विश्व गुरु सोने की चिड़िया के रूप में अपने को स्थापित करने के लिए अब एक मात्र देश में आर्थिक क्रांति के माध्य से बचा जा सकता है इसमें हमारे देश के नागरिक युवा महिलाएं सभी मिलकर काम करें, नौकरी करने के बजाय स्वयं व्यवसायिक प्रतिष्ठानों के माध्यम से अपने आप को स्थापित करने की जरूरत है, आज देश में व्यावसायिक घराना उंगलियों पर गिने जा सकते हैं हम चाहते हैं कि भारत के हर नागरिक यानी करोडो के तादाद में अरबपतियों की श्रेणी में अपने आप को स्थापित कर देश को विश्व गुरु बनाने में सहयोग प्रदान करें यह अचूक सुझाव मार्गदर्शन है इसे पालन करना हम सभी का नैतिक दायित्व है ताकि भारत गरीबों की श्रेणी से ऊपर उठकर विकसित देसो की श्रेणी में गिने जाएl
विनोद सिन्हा के साथ यह विशेष बातचीत आपातकाल के 50 साल पूरे होने पर एक महत्वपूर्ण संदर्भ प्रदान करती है। यह बातचीत हमें यह याद दिलाती है कि लोकतंत्र को कैसे खतरा हो सकता है और कैसे हमें अपने अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए ।



