मार्च के पहले पखवाड़े में, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, रुपये की गिरावट, और भारत की ग्रोथ और कॉर्पोरेट कमाई पर कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के असर को लेकर चिंताओं के बीच, विदेशी निवेशकों ने घरेलू इक्विटी से 52,704 करोड़ रुपये (लगभग 5.73 अरब डॉलर) निकाल लिए. खास बात तो ये है कि बीते करीब 13 महीनों की सबसे बड़ी बिकवाली है. पिछली बार जनवरी 2025 में विदेशी निवेशकों ने 70 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा की बिकवाली की थी. उसके बाद अब ऐसी बिकवाली देखने को मिली है. खास बात तो ये है कि महीने का दूसरा पखवाड़ा अभी शुरू होना है. ऐसे में उम्मीद लगाई जा रही है कि अगर मिडिल ईस्ट में जंग जारी रही और शेयर बाजार में गिरावट देखने को मिली तो ये आंकड़ा 70 हजार करोड़ रुपए से कहीं आगे जा सकता है. आइए आपको भी बताते हैं कि आखिर विदेशी निवेशकों की बिकवाली को लेकर किस तरह के आंकड़े सामने आए हैं.
विदेशी निवेशकों की रिकॉर्ड बिकवाली
एनएसडीएल के आंकड़ों के अनुसार मार्च के पहले पखवाड़े में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से 52,704 करोड़ रुपये (लगभग 5.73 अरब डॉलर) निकाल लिए हैं. यह ताज़ा बिकवाली तब हुई है जब विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने फरवरी में भारतीय इक्विटी में 22,615 करोड़ रुपये का निवेश किया था, जो 17 महीनों में सबसे ज़्यादा मासिक निवेश था. उससे पहले, FPIs लगातार तीन महीनों तक शुद्ध विक्रेता रहे थे. डिपॉजिटरी डेटा के अनुसार, उन्होंने जनवरी में 35,962 करोड़ रुपए, दिसंबर में 22,611 करोड़ रुपए और नवंबर में 3,765 करोड़ रुपए निकाले थे. खास बात तो ये है कि जनवरी 2025 के बाद विदेशी निवेशकों की सबसे बड़ी बिकवाली मानी जा रही है. तब विदेशी निवेशकों ने बाजार से 78,027 करोड़ रुपए की बिकवाली की थी.
क्यों देखने को मिली बिकवाली?
बाजार विशेषज्ञों ने इस निकासी का मुख्य कारण पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव को बताया. एंजल वन के सीनियर फंडामेंटल एनालिस्ट वकार जावेद खान ने कहा कि इस क्षेत्र में बढ़ते तनाव और लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बाधित होने के डर ने ब्रेंट क्रूड को 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंचा दिया, जिससे ‘रिस्क-ऑफ’ (जोखिम से बचने वाला) कदम उठाना पड़ा. इसमें रुपए की लगातार कमजोरी (जो 92 रुपये के स्तर के करीब थी), US बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और पहले हुए निवेश पर मुनाफा-वसूली ने और भी इजाफा कर दिया.
जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के चीफ़ इन्वेस्टमेंट स्ट्रेटेजिस्ट VK विजयकुमार ने कहा कि पश्चिम एशिया में संघर्ष के बाद वैश्विक इक्विटी में आई कमजोरी, रुपए की गिरावट, और भारत की ग्रोथ और कॉर्पोरेट कमाई पर कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के असर को लेकर चिंताओं ने FPIs के सेंटीमेंट पर बुरा असर डाला है.
उन्होंने आगे कहा कि पिछले 18 महीनों में विकसित और उभरते बाजारों की तुलना में भारत से कमजोर रिटर्न मिलने के कारण भी FPIs ने भारत में निवेश को लेकर उदासीनता दिखाई है. उनके अनुसार, दक्षिण कोरिया, ताइवान और चीन को इस समय ज्यादा आकर्षक बाजार माना जा रहा है, क्योंकि हालिया सुधार के बाद भी वे भारत की तुलना में अभी भी सस्ते हैं और उनमें कॉर्पोरेट कमाई की बेहतर संभावनाएं हैं. इसलिए, कम समय के लिए भारत में FPIs द्वारा और अधिक बिकवाली होने की संभावना है.
क्या है पॉजिटिव साइन?
पॉजिटिव साइन यह है कि वित्तीय शेयरों में FPIs की भारी बिकवाली के कारण घरेलू निवेशकों के लिए शेयरों का मूल्यांकन (valuations) आकर्षक हो गया है. मार्च के दूसरे पखवाड़े के लिए, खान ने कहा कि आउटलुक सतर्क बना हुआ है. अगर भू-राजनीतिक तनाव कम होता है या अगर बैंकिंग और कंजम्पशन सेक्टर से Q4 की कमाई उम्मीद से बेहतर रहती है, तो आउटफ्लो कम हो सकता है. हालांकि, तेल की कीमतों में कोई और उछाल या नए सिरे से वैश्विक अनिश्चितता बिकवाली के दबाव को बढ़ा सकती है.
आईटी सेक्टर से निकाला पैसा
सेक्टर-वार देखें तो, 2025 में अब तक IT सेक्टर में सबसे ज्यादा आउटफ्लो देखा गया है. FPIs ने कमजोर रेवेन्यू ग्रोथ, टैरिफ से जुड़ी अनिश्चितता और वैश्विक टेक खर्च में कमी के चलते करीब 74,700 करोड़ रुपए निकाले हैं. सेंट्रिसिटी वेल्थटेक के को-फाउंडर आदित्य शंकर ने बताया कि इसके बाद FMCG सेक्टर में करीब 36,800 करोड़ रुपए का आउटफ्लो हुआ, जिसकी वजह शहरी कंजम्पशन में सुस्ती और मार्जिन पर दबाव था.
पावर और हेल्थकेयर सेक्टर में भी भारी बिकवाली देखने को मिली, जिसमें 24,000-26,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का आउटफ्लो हुआ. इसकी मुख्य वजह कमाई के मुकाबले वैल्यूएशन का ज्यादा होना था. उन्होंने आगे कहा कि इस बीच, FPIs ने टेलीकॉम, ऑयल और गैस, मेटल्स और केमिकल्स सेक्टर में अपना निवेश बढ़ाया है, जो घरेलू वैल्यू और कमोडिटी से जुड़े निवेश की ओर बदलाव का संकेत देता है.
