Vedant Samachar

बरसाने की तर्ज पर पंतोरा में 300 साल पुरानी ‘डंगाही होली’: रंग पंचमी पर कुंवारी कन्याएं बरसाती हैं लाठियां

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जांजगीर-चांपा,02मार्च (वेदांत समाचार)। होली का उत्साह देशभर में अलग-अलग रंगों और परंपराओं के साथ दिखाई देता है, लेकिन छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिला के पंतोरा गांव में मनाई जाने वाली होली अपनी अनोखी परंपरा के कारण खास पहचान रखती है। यह परंपरा उत्तर प्रदेश के बरसाना की लट्ठमार होली की याद दिलाती है, जहां महिलाएं पुरुषों पर लाठियां बरसाती हैं। पंतोरा में भी रंग पंचमी के दिन कुछ ऐसा ही दृश्य देखने को मिलता है।

जिला मुख्यालय से लगभग 40-45 किलोमीटर दूर स्थित पंतोरा गांव में पिछले करीब 300 वर्षों से ‘डंगाही होली’ की परंपरा निभाई जा रही है। होली के पांचवें दिन यानी रंग पंचमी को यह आयोजन होता है। सुबह से ही गांव में उत्सव का माहौल बन जाता है। ढोल-नगाड़ों, फाग गीतों और जयकारों के बीच ग्रामीण मंदिर परिसर में जुटते हैं।

इस आयोजन की शुरुआत गांव के मां भवानी मंदिर से होती है। पूजा-अर्चना के बाद कुंवारी कन्याएं सबसे पहले देवी-देवताओं को प्रतीकात्मक रूप से छड़ी मारकर परंपरा का आगाज करती हैं। इसके बाद मंदिर के बाहर खड़ी कन्याओं की टोली वहां से गुजरने वाले हर व्यक्ति पर लाठियां बरसाती है। बच्चे, युवा और बुजुर्ग—सभी इस परंपरा का हिस्सा बनते हैं।

ग्रामीणों के अनुसार इस पर्व के लिए विशेष बांस की छड़ियां कोरबा जिले के मड़वारानी जंगल से लाई जाती हैं। मान्यता है कि वही बांस शुभ होता है, जो एक ही कुल्हाड़ी के वार में कट जाए। छड़ियों को मां भवानी के समक्ष अभिमंत्रित किया जाता है और गांव के बैगा (पारंपरिक पुजारी) द्वारा सिद्ध कराया जाता है। इसके बाद इन्हें कन्याओं को सौंपा जाता है।

स्थानीय लोगों की अटूट आस्था है कि इन अभिमंत्रित छड़ियों की मार खाने से व्यक्ति साल भर बीमारियों से दूर रहता है। लोग इसे चोट के रूप में नहीं, बल्कि माता के आशीर्वाद और प्रसाद के रूप में स्वीकार करते हैं। यही कारण है कि केवल स्थानीय निवासी ही नहीं, बल्कि दूर-दराज से आए रिश्तेदार भी इस आयोजन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। यहां तक कि रास्ते से गुजरने वाले राहगीर भी रुककर छड़ी की मार खाना शुभ मानते हैं।

पंतोरा गांव की निवासी मुन्नी बताती हैं कि पूजा के बाद बैगा सिद्ध छड़ियां कन्याओं को सौंप देते हैं और फिर लड़कियों की टोली मंदिर के बाहर तैनात हो जाती है। इस दौरान किसी प्रकार का विरोध या नाराजगी देखने को नहीं मिलती। पूरा आयोजन आस्था, विश्वास और उल्लास के माहौल में संपन्न होता है।

समय के साथ भले ही दुनिया बदल गई हो, लेकिन पंतोरा की यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जा रही है। ‘डंगाही होली’ न केवल गांव की सांस्कृतिक पहचान है, बल्कि सामुदायिक एकता और लोक आस्था का जीवंत उदाहरण भी है। रंग पंचमी के दिन यहां का दृश्य देखने लायक होता है, जब परंपरा, विश्वास और उत्सव एक साथ रंगों में सराबोर नजर आते हैं।

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