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कोरबा: मेडिकल कॉलेज अस्पताल में 13 माह की मासूम बच्ची की इलाज के दौरान मौत; परिजनों ने किया हंगामा

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कोरबा,25फरवरी (वेदांत समाचार)। जिला मेडिकल कॉलेज अस्पताल में एक बार फिर गंभीर लापरवाही का मामला सामने आया है। डॉक्टरों और स्टाफ की लापरवाही के चलते 13 महीने की मासूम की मौत हो गई। परिजनों का आरोप है कि गलत इंजेक्शन लगाए जाने के बाद बच्ची की हालत बिगड़ गई और वह कोमा में चली गई, जिसके बाद उपचार के दौरान देर रात उसकी मौत हो गई। घटना के बाद आक्रोशित परिजन धरने पर बैठ गए हैं और दोषी डॉक्टरों और कर्मचारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है।

परिजनों के मुताबिक, 20 फरवरी को 13 महीने की मासूम वानिया केवट को सर्दी-बुखार की शिकायत पर स्वर्गीय बिसाहू दास महंत स्मृति शासकीय मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया था। उपचार के दौरान ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टरों और स्टाफ ने इंजेक्शन लगाया, जिसके कुछ ही समय बाद बच्ची की तबीयत बिगड़ने लगी। हालत गंभीर होने पर उसे ICU में रखा गया, लेकिन मंगलवार की रात बच्ची ने दम तोड़ दिया।

घटना से आक्रोशित परिजनों ने अस्पताल प्रबंधन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि जिला मेडिकल कॉलेज में अधिकांश इलाज ट्रेनी डॉक्टरों और अप्रशिक्षित स्टाफ के भरोसे किया जा रहा है, जिससे मरीजों की जान जोखिम में पड़ रही है। वहीं प्रदर्शन के दौरान परिजनों ने अस्पताल के अधीक्षक गोपाल कंवर को घेर लिया। भीड़ को देखकर अधीक्षक अपने केबिन की ओर भाग गए, जिसके बाद गुस्साए लोग गेट के सामने बैठकर धरने पर बैठ गए। परिजनों का कहना है कि जब तक दोषियों पर कार्रवाई नहीं होती, तब तक वे मासूम का पोस्टमार्टम नहीं कराएंगे।

मृत बच्ची की नानी अमृता निषाद ने बताया कि 20 फरवरी को मेरी नातिन को सर्दी-बुखार की शिकायत पर जिला अस्पताल कोरबा लाया गया था। डॉक्टर को दिखाने पर पहले मसाज और भाप देने की सलाह दी गई। बार-बार अस्पताल आने-जाने में परेशानी होने के कारण बच्ची को भर्ती करा दिया गया। भर्ती के दौरान जब इंजेक्शन लगाया जा रहा था, तब बच्ची बहुत ज्यादा रोने लगी। बच्ची की मां ने स्टाफ से कहा कि पहले बच्ची को शांत होने दें, फिर इंजेक्शन लगाएं, लेकिन स्टाफ ने बात नहीं मानी। इंजेक्शन लगाने वाली मेडिकल कॉलेज की छात्रा लग रही थी, जो डरी हुई थी। बच्ची की मां ने इंजेक्शन नहीं लगाने की बात कही, लेकिन फिर भी इंजेक्शन लगा दिया गया। इंजेक्शन लगते ही बच्ची की हालत अचानक बिगड़ गई, उसकी सांस अटकने लगी और वह तुरंत कोमा में चली गई। इसके बाद डॉक्टरों को बुलाया गया और आपात स्थिति में इलाज शुरू किया गया। बच्ची उस दिन (20 फरवरी) से कोमा में रही, लेकिन इलाज का कोई असर नहीं हुआ और 24 फरवरी की रात करीब 9:30 बजे डॉक्टरों ने बच्ची की मौत की जानकारी दी।

उन्होंने कहा कि जिला मेडिकल कॉलेज बनने के बाद से अस्पताल में लगातार लापरवाही सामने आ रही है। यहां अधिकतर इलाज प्रशिक्षु डॉक्टरों और स्टाफ के भरोसे किया जा रहा है। जब तक प्रशिक्षित डॉक्टरों और नर्सों से इलाज नहीं कराया जाएगा, तब तक हालात नहीं सुधरेंगे। अस्पताल में स्टाफ अक्सर मोबाइल फोन में व्यस्त रहता है और मरीजों पर ध्यान नहीं देता। हम न्याय चाहते हैं। जब लोग भरोसा करके जिला अस्पताल आते हैं, तो अस्पताल को उस भरोसे पर खरा उतरना चाहिए।

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