Vedant Samachar

कोरबा के कुर्रुडीह में ‘संवरा’ बस्ती मुख्यधारा से दूर, प्रमाण पत्रों के अभाव में 156 लोगों को योजनाओं का लाभ नहीं, सांप पकड़ना रहा परंपरागत पेशा

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हरीश तिवारी की रिपोर्टिंग

कोरबा, 16 फरवरी (वेदांत समाचार)। जिले के करतला विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत मुकुंदपुर के कुर्रुडीह गांव के संवरा टोला में निवासरत संवरा जनजाति के 95 परिवार आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। कुल 156 सदस्यों वाले इस समुदाय के अधिकांश परिवारों के पास न तो जाति प्रमाण पत्र है और न ही जन्म प्रमाण पत्र। राशन कार्ड और आधार जैसे जरूरी दस्तावेज भी कई लोगों के पास उपलब्ध नहीं हैं, जिससे वे शासन की विभिन्न योजनाओं का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं।

ग्रामीणों के अनुसार अंग्रेजों के समय हुए किसी सर्वेक्षण में नाम दर्ज न होने के कारण आज तक किसी भी परिवार के पास संवरा आदिवासी का वैध जाति प्रमाण पत्र नहीं बन पाया। शिक्षा का स्तर बेहद निम्न है। राजकुमार नामक युवक आठवीं तक पढ़ा है, लेकिन प्रमाण पत्र के अभाव में आगे की पढ़ाई नहीं कर सका। उसका कहना है कि यदि जाति प्रमाण पत्र होता तो वह उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकता था। समुदाय के अधिकांश लोग पहचान संबंधी दस्तावेजों के अभाव में अपनी सामाजिक स्थिति प्रमाणित करने में भी असमर्थ हैं।

68 लोगों का आधार अब तक नहीं

करीब 150 से अधिक आबादी के बीच 68 लोगों का आधार कार्ड अब तक नहीं बन पाया है। कई परिवारों के पास राशन कार्ड भी नहीं है। जन्म प्रमाण पत्र और जाति प्रमाण पत्र का तो सवाल ही नहीं उठता। परिणामस्वरूप शासकीय योजनाओं का लाभ इन तक पूर्ण रूप से नहीं पहुंच पा रहा है।

राधिका

सांप पकड़ना रहा परंपरागत व्यवसाय

संवरा जनजाति का परंपरागत पेशा सांप पकड़ना और उससे आजीविका चलाना रहा है। ग्रामीण खजनती सौरा सिदार बताती हैं कि पहले सांप दिखाकर या पकड़कर जो आय होती थी, उसी से परिवार का भरण-पोषण होता था। हालांकि वन विभाग द्वारा सांपों को जंगल में छोड़ दिए जाने के बाद यह पेशा लगभग समाप्त हो गया है। वर्तमान में अधिकांश लोग मजदूरी कर जीवन यापन कर रहे हैं।

कमलेशी बताती हैं कि अब सांप नहीं, बल्कि मेहनत-मजदूरी ही सहारा है। वहीं राधिका का कहना है कि समुदाय में विवाह भी अपने ही समाज में होते हैं और लड़कियों की शादी कम उम्र में कर दी जाती है।

ख़ज़नती संवरा सिदार

पचहर में सांप देने की परंपरा

समुदाय में विवाह के समय ‘पचहर’ के रूप में सांप देने की परंपरा रही है। परंतु अब सांप दुर्लभ होने से यह परंपरा भी प्रभावित हो रही है। कई युवतियां विवाह योग्य हो चुकी हैं, लेकिन सामाजिक और आर्थिक कारणों से उनके विवाह नहीं हो पा रहे हैं।

अमरीका बाई

पलायन और अस्थायी निवास

अमरीका बाई बताती हैं कि बस्ती के 20-25 परिवार रोजगार की तलाश में बाहर चले गए हैं। कई लोग स्थायी रूप से यहां नहीं रहते, बल्कि कुछ समय बाद अपने पारंपरिक पेशे या मजदूरी के लिए अन्य जिलों—कारकोमा (कोरबा), बीकमपुर (रायगढ़) और झलमा (दुर्ग)—की ओर चले जाते हैं। कर्ज लेकर जीवन यापन करना और फिर उसकी भरपाई न होने पर पलायन करना आम बात है।

लखेसिन बाई

कम कद के कारण विवाह में बाधा

बस्ती में रहने वाली लखेसिन बाई का विवाह केवल कम कद के कारण नहीं हो पा रहा है। उन्हें अपनी उम्र का भी सही अंदाजा नहीं है। यह स्थिति समुदाय में व्याप्त सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन को दर्शाती है।

सरपंच ने जताई चिंता

ग्राम पंचायत मुकुंदपुर की सरपंच श्रीमती करमदेवी कंवर ने बताया कि प्रयास किए जा रहे हैं कि समुदाय को शासकीय योजनाओं का शत-प्रतिशत लाभ मिल सके। लेकिन दस्तावेजों की कमी और अस्थायी निवास के कारण प्रक्रिया जटिल हो जाती है।

विशेष योजना की जरूरत

स्थिति का अवलोकन करने पर स्पष्ट होता है कि संवरा जनजाति को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए राज्य या जिला स्तर पर विशेष अभियान चलाने की आवश्यकता है। दस्तावेज निर्माण, शिक्षा, आजीविका और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं को प्राथमिकता से लागू किया जाए, अन्यथा यह जनजाति अपनी पहचान और अस्तित्व दोनों के संकट से जूझती रहेगी।

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