रायपुर/कोरबा, प्रतिनिधि। छत्तीसगढ़ राज्य नागरिक आपूर्ति निगम के कोरबा एवं कटघोरा स्थित प्रदाय केंद्रों में कस्टम मिल्ड राइस (CMR) की स्वीकृति को लेकर बड़े पैमाने पर अनियमितता सामने आई है। नान मुख्यालय की जांच टीम द्वारा किए गए गुणवत्ता निरीक्षण में मिलर्स से प्राप्त हजारों क्विंटल चावल प्रथम दृष्टया घटिया स्तर का पाया गया है। जांच रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि अन्य जिलों में पदस्थ तकनीकी कर्मचारियों की आईडी, पासवर्ड और ओटीपी का उपयोग कर चावल के लॉट स्वीकृत किए गए।
गौरतलब है कि CMR वह चावल है, जिसे मिलर्स किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीदे गए धान की कस्टम मिलिंग के बाद निर्धारित अनुपात में सरकारी एजेंसियों को लौटाते हैं। यही चावल सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत राशन दुकानों से कार्डधारियों को वितरित किया जाता है।
सूत्रों के अनुसार, जांच में पाया गया कि जब कुछ लॉट स्वीकृत किए गए, उस समय संबंधित तकनीकी सहायक भौतिक रूप से कोरबा प्रदाय केंद्र में मौजूद ही नहीं थे। इसके बावजूद सर्वर लॉगिन कर लॉट स्वीकार किए गए। रिपोर्ट में पूर्व प्लेसमेंट कर्मचारी प्रकाश बरेठ का नाम भी सामने आया है, जिस पर अन्य जिलों के तकनीकी सहायकों की आईडी से लॉगिन कर ओटीपी साझा करने का आरोप है। जबकि नान मुख्यालय के निर्देशानुसार आईडी, पासवर्ड और ओटीपी साझा करना पूर्णतः प्रतिबंधित है।
मामले में आठ तकनीकी सहायक स्तर के कर्मचारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। बेमेतरा जिले के कर्मचारी महेश्वर लाल सोनवानी की आईडी कोरबा स्थानांतरित होने पर भी सवाल उठ रहे हैं। संबंधित अधिकारी द्वारा उन्हें मूल जिले में रोके रखने के बावजूद आईडी ट्रांसफर की प्रक्रिया कैसे हुई, यह जांच का विषय बना हुआ है।
पूरे घटनाक्रम में जिला प्रबंधकों की भूमिका पर भी प्रश्नचिह्न लग रहे हैं। भौतिक रूप से अनुपस्थित कर्मचारियों की आईडी से स्वीकृति प्रक्रिया चलती रही, इसके बावजूद स्थानीय प्रशासनिक स्तर पर आपत्ति क्यों नहीं उठाई गई—यह प्रश्न भी जांच के दायरे में है।
छत्तीसगढ़ राज्य नागरिक आपूर्ति निगम के अध्यक्ष संजय श्रीवास्तव ने कहा है कि चावल की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। प्रारंभिक जांच के आधार पर गुणवत्ता निरीक्षक सहित संबंधित कर्मियों को निलंबित कर नोटिस जारी किया गया है। विस्तृत जांच जारी है और रिपोर्ट आने के बाद दोषी अधिकारियों पर भी सख्त कार्रवाई की जाएगी। मामले ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली की पारदर्शिता और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
