Vedant Samachar

देश का पहला गणतंत्र दिवस! ₹11,093 का बिल और 1950 का ऐतिहासिक जश्न, जिसे देख दंग रह गई थी दुनिया

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भारत अपना 77वां गणतंत्र दिवस एक भव्य सैन्य परेड के साथ मनाने जा रहा है, जिसमें देश की सैन्य शक्ति, सांस्कृतिक विविधता और तकनीकी प्रगति का प्रदर्शन किया जाएगा. ब्रिटिश काल की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए, यह परेड रायसीना हिल्स से शुरू होगी, कर्तव्य पथ से होते हुए इंडिया गेट से गुजरेगी और लाल किले पर समाप्त होगी. इस आयोजन का उद्देश्य सैन्य क्षमता का प्रदर्शन करना, देशभक्ति को बढ़ावा देना, सशस्त्र बलों की विभिन्न इकाइयों को उजागर करना और सेवाओं में लैंगिक विविधता को प्रदर्शित करना है. क्या आपको इस बात की जानकारी है कि इस पूरे आयोजन में कितना खर्च होता है? क्या आपको ये पता है कि देश के पहले गणतंत्र दिवस ऐतिहासिक जश्न पर कितना खर्च हुआ था. आइए आपको इसकी पूरी जानकारी देते हैं…

देश क पहले गणतंत्र दिवस पर कितना खर्च?
स्वतंत्रता के बाद से गणतंत्र दिवस परेड हर साल आयोजित की जाती रही है और आमतौर पर इसमें करोड़ों रुपये खर्च होते हैं. हालांकि हाल के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन रिपोर्टों के अनुसार सरकार ने 2015 में 320 करोड़ रुपये खर्च किए थे. हालांकि, शुरुआती वर्षों में लागत काफी कम थी. जब भारत ने 1950 में अपना पहला गणतंत्र दिवस मनाया था, तब कुल खर्च लगभग 11,250 रुपये आंका गया था और बाद में इसे 11,093 रुपये बताया गया. वर्षों के दौरान, इसके खर्च में लगातार इजाफा होता चला गया. द हिंदू की एक रिपोर्ट के अनुसार, गणतंत्र दिवस पर होने वाला खर्च 1956 में बढ़कर 5,75,000 रुपए, 1971 में 17,12,000 रुपए, 1973 में 23,38,000 रुपए और 1988 में 69,69,159 रुपए हो गया.

कुछ इस तरह सेलीब्रेट हुआ था पहला गणतंत्र दिवस
पीटीआई द्वारा प्राप्त अभिलेखों से पता चलता है कि दिल्ली प्रशासन ने रिलीफ होम्स और और ग्रामीण स्कूलों में सादे समारोहों के माध्यम से पहला गणतंत्र दिवस मनाया. बच्चों को स्मृति चिन्ह के रूप में थालियां दी गईं, जबकि महिला कैदियों को मिठाई और खिलौने वितरित किए गए.
फाइलों से पता चलता है कि समारोह काफी हद तक डिसेंट्रलाइज थे, जिनमें बच्चों, विस्थापित परिवारों और सरकारी संस्थानों में रहने वाली महिलाओं पर विशेष ध्यान दिया गया था, जो विभाजन के बाद के उथल-पुथल से उबर रहे शहर की स्थिति को दर्शाते हैं.

दिल्ली के ग्रामीण क्षेत्रों में, गणतंत्र दिवस के कार्यक्रम जिला बोर्ड द्वारा आयोजित किए गए थे. अभिलेखों में दर्ज है कि स्कूल के बच्चों को स्मृति चिन्ह के रूप में थालियां दी गईं, जबकि इस अवसर को मनाने के लिए संस्थानों को झंडे, डंडे और मोमबत्तियां उपलब्ध कराई गईं.
राहत गृहों में रहने वाली महिला कैदियों को भी समारोहों में शामिल किया गया था. दिल्ली के तत्कालीन मुख्य आयुक्त के कार्यालय की फाइलों में दर्ज है कि प्रांतीय महिला अनुभाग ने महिला अनुभाग गृहों में समारोह आयोजित किए, जहां 26 जनवरी, 1950 को फल, मिठाई और खिलौने वितरित किए गए.
जिसके लिए 750 रुपए की राशि स्वीकृत की गई थी, जिसमें से लगभग 525 रुपए खर्च हुए थे और 225 रुपए शेष बचे थे. मार्च 1950 के बाद के पत्राचार से पता चलता है कि शेष राशि का उपयोग उसी वर्ष बाद में महिला अनुभाग दिवस समारोह के लिए करने की अनुमति दी गई थी.
शेष राशि का उपयोग विभिन्न घरों से महिलाओं को लाने-ले जाने, फर्नीचर किराए पर लेने और बच्चों के लिए जलपान की व्यवस्था करने पर किया गया था. यह व्यय ‘राहत और पुनर्वास’ मद में दर्ज किया गया था.
फाइलों में उल्लिखित महिला अनुभाग गृह, विभाजन के बाद विस्थापित महिलाओं और बच्चों के पुनर्वास के लिए दिल्ली में स्थापित छात्रावासों और राहत संस्थानों के व्यापक नेटवर्क का हिस्सा थे. अभिलेखीय सामग्री के अनुसार, प्रांतीय महिला अनुभाग का कार्यालय पी ब्लॉक, नई दिल्ली में स्थित था.
उस समय, मध्य दिल्ली में, कनॉट प्लेस और उसके आसपास के क्षेत्रों सहित, कई महिला हॉस्टल थे जो विस्थापन से प्रभावित महिलाओं को आश्रय, भोजन और बुनियादी सहायता प्रदान करते थे.
इन दस्तावेजों को समग्र रूप से देखने पर पता चलता है कि दिल्ली का पहला गणतंत्र दिवस किसी भव्य आयोजन के बजाय औपचारिक अनुमोदन और बजटीय निगरानी द्वारा समर्थित सुनियोजित कल्याणकारी गतिविधियों के माध्यम से मनाया गया था.

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