Vedant Samachar

KORBA : जो भीतर के विष को पचा ले वही अमृत का अधिकारी, विपरीत परिस्थितियों में स्वयं को संभालना ही सफलता का मूलमंत्र – पं. सौरभ शर्मा…

Vedant Samachar
4 Min Read

कोरबा,24 जनवरी (वेदांत समाचार)। जीवन में सफलता पाने के लिए व्यक्ति को स्वयं को तपाना पड़ता है। अमृत का अधिकारी वही बनता है, जो अपने भीतर के विष को पचाने की क्षमता रखता हो। संसार की बुराइयों को सुनकर, ठोकरें खाकर भी जो स्वयं को संभाले रखता है, वही वास्तव में सफल होता है। यह विचार पहरिया से पधारे विख्यात कथावाचक पं. सौरभ शर्मा ने स्व. हर प्रसाद जायसवाल जी के वार्षिक श्राद्ध निमित्त गृह ग्राम पोंडीबहार में आयोजित संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा महापुराण ज्ञान यज्ञ के चौथे दिवस समुद्र मंथन प्रसंग के दौरान व्यक्त किए।

सत्यनारायण मंदिर के सामने सावित्री जायसवाल एवं समस्त जायसवाल (पांडे) परिवार द्वारा आयोजित इस संगीतमय कथा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उमड़ रहे हैं। पं. सौरभ शर्मा ने कथा अमृत का रसपान कराते हुए कहा कि अमृत से भी अधिक शक्ति वेदमंत्रों में होती है। यदि मुकाबले की स्थिति उत्पन्न हो, तो अमृतपान करने वाले पर वेदमंत्र धारक की विजय निश्चित है, बशर्ते वह गायत्री मंत्र का साधक हो।

उन्होंने बताया कि इस जगत में सर्वप्रथम अमृतपान करने वाले देवादिदेव महादेव हैं। हलाहल विषपान से पूर्व उन्होंने करोड़ों वेदमंत्रों में से एक राम नाम रूपी अमृत का पान किया था। रामनाम अमृत से युक्त होकर ही भोलेनाथ ने जगत कल्याण के लिए हलाहल विषपान किया और नीलकंठ कहलाए। हृदय में अमृत और कंठ में विष धारण करने से महादेव के शरीर में विष का प्रभाव स्थिर हो गया।

व्यासपीठ से पं. शर्मा ने धन और समृद्धि का सूत्र बताते हुए कहा कि माता लक्ष्मी के साथ भगवान गणेश और माता सरस्वती की पूजा अनिवार्य है। गणेश जी बुद्धि और सिद्धि के दाता हैं, उनकी आराधना से लक्ष्मी का आगमन होता है, लेकिन लक्ष्मी वहीं स्थायी रूप से निवास करती हैं जहां सरस्वती जी का वास अर्थात् सन्मति होती है। जिस परिवार में सन्मति होती है, वहां लक्ष्मी का दीर्घकालिक वास होता है।

उन्होंने सद्पुरुषों के सम्मान पर बल देते हुए कहा कि ब्राह्मण, संत या आमजन—किसी का भी निरादर नहीं करना चाहिए। यदि वे स्वयं बदला न लें, तो परमात्मा लेते हैं। दुर्वासा ऋषि के श्राप से इंद्र को स्वर्ग का सुख खोना पड़ा, तब स्वयं भगवान भी प्रत्यक्ष सहायता नहीं कर सके।

कथावाचक पं. सौरभ शर्मा ने भगवान श्रीहरि विष्णु के वामन अवतार प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने बताया कि दो पग में दो लोक नाप लेने वाले भगवान वामन की माया से भी दानवीर राजा बलि विचलित नहीं हुए। अपनी अनन्य भक्ति और समर्पण का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए राजा बलि ने स्वयं को तीसरे पग के लिए प्रस्तुत कर दिया और पाताल लोक के अधिकारी बने। उन्हें पाताल के सभी द्वारों पर नारायण के द्वारपाल रूप में दर्शन प्राप्त हुए और माता लक्ष्मी को बहन रूप में पाकर जीवन धन्य किया।

संगीतमय कथा के दौरान भगवान वामन की मनोहारी झांकी भी निकाली गई, जहां श्रद्धालुओं ने भगवान वामन के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। पोंडीबहार में आयोजित इस श्रीमद्भागवत कथा से पूरे क्षेत्र में भक्ति और श्रद्धा का वातावरण बना हुआ है।

Share This Article