कोरबा,27 दिसंबर (वेदांत समाचार)। जब ज़िंदगी ढलान की ओर बढ़ती है, तब अक्सर लोग अपने लिए सोचते हैं, लेकिन बालकोनगर के दो बुजुर्ग दोस्तों ने समाज के लिए सोचकर एक मिसाल कायम कर दी। रोज़ की सुबह की सैर के दौरान उपजी एक साधारण बातचीत ने उन्हें ऐसा फैसला लेने के लिए प्रेरित किया, जो मरणोपरांत भी कई ज़िंदगियों को रोशन करेगा।
बालकोनगर क्षेत्र के कैलाशनगर-बेलाकछार निवासी विवारू राम नोनिया और बुद्धू दास महंत पिछले दस वर्षों से हर सुबह साथ-साथ टहलने निकलते हैं। उम्र के इस पड़ाव पर बातचीत अक्सर जीवन की सच्चाइयों तक जा पहुँचती है। एक दिन बात इस सवाल पर ठहर गई—निधन के बाद शरीर का क्या?
दोनों मित्रों ने महसूस किया कि यदि अंतिम संस्कार के बजाय देहदान किया जाए तो मेडिकल कॉलेज में पढ़ने वाले भावी डॉक्टरों को सीखने का अवसर मिलेगा, वहीं नेत्रदान से किसी की बुझी हुई दुनिया में रोशनी लौटाई जा सकती है। इसी मानवीय सोच ने दोनों को भीतर तक झकझोर दिया।
चलते-चलते लिया गया यह संकल्प केवल विचारों तक सीमित नहीं रहा। दोनों बुजुर्ग मित्र मेडिकल कॉलेज अस्पताल पहुँचे और देहदान-नेत्रदान की प्रक्रिया पूरी की। उनके चेहरे पर संतोष था—समाज के लिए कुछ कर गुजरने का संतोष।
विवारू राम नोनिया और बुद्धू दास महंत का यह निर्णय बताता है कि सेवा की कोई उम्र नहीं होती। उनका यह कदम समाज को यह संदेश देता है कि जीवन के बाद भी इंसान किसी के लिए जीवनदायी बन सकता है।



