Vedant Samachar

एक कप चाय से भी सस्ता इंटरनेट: भारत दुनिया का सबसे किफायती डिजिटल बाजार

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भारत में मोबाइल डेटा अब केवल एक सेवा नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की ज़रूरत बन चुका है. सुबह के अलार्म से लेकर रात की आख़िरी स्क्रॉल तक—दैनिक जीवन का बड़ा हिस्सा इंटरनेट पर निर्भर है. दिलचस्प यह है कि जिस सुविधा का भारत में बड़े पैमाने पर उपयोग हो रहा है, उसी के लिए दुनिया के कई देशों में उपभोक्ताओं को भारी कीमत चुकानी पड़ती है.

अंतरराष्ट्रीय तुलना के मुताबिक, अमेरिका में 140 मिनट कॉल, 70 SMS और 2GB डेटा वाले मोबाइल पैकेज की औसत लागत लगभग 48.95 डॉलर (लगभग 4389 रुपए) है. ब्रिटेन में यही खर्च 12.62 डॉलर (लगभग 1131 रुपए) और ऑस्ट्रेलिया में 23.07 डॉलर (लगभग 2068 रुपए) से अधिक है. इसके मुक़ाबले भारत में वही मोबाइल सेवा पैकेज औसतन 1.86 डॉलर (लगभग 166 रुपए) में उपलब्ध है, जो वैश्विक स्तर पर सबसे कम दरों में शामिल है. यही कम लागत वाला मोबाइल डेटा भारत की डिजिटल ताकत के रूप में उभरा है.

पड़ोसियों से लेकर पश्चिमी देशों तक, कीमतों में बड़ा अंतर
पड़ोसी देशों की तुलना करें तो अंतर और स्पष्ट हो जाता है. चीन में मोबाइल सेवाओं की औसत लागत 8.56 डॉलर (लगभग 767 रुपए), नेपाल में 2.72 डॉलर (लगभग 243 रुपए), बांग्लादेश में 2.40 डॉलर (लगभग 215 रुपए) और भूटान में 4.56 डॉलर (लगभग 408 रुपए) दर्ज की गई है.

पाकिस्तान में यह लागत 1.43 डॉलर (लगभग 143 रुपए) है, जो भारत से थोड़ी कम है. हालांकि, भारत में मोबाइल और इंटरनेट सेवाओं की पहुंच करोड़ों उपभोक्ताओं तक है, जिससे कम कीमत का प्रभाव अभूतपूर्व पैमाने पर दिखाई देता है. यानी भारत सिर्फ सस्ता इंटरनेट नहीं देता, बल्कि बड़े पैमाने पर सस्ता इंटरनेट उपलब्ध कराने वाले देशों में शामिल है.

यह कम लागत संभव कैसे हुई?
केंद्र सरकार के अनुसार इसके पीछे कोई अचानक बदलाव नहीं, बल्कि वर्षों की नीतिगत प्रक्रिया है. सरकार की टेलीकॉम नीतियों और भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (TRAI) के नियामक ढांचे के तहत टैरिफ को बड़े पैमाने पर बाजार-आधारित रखा गया. मौजूदा व्यवस्था में टेलीकॉम कंपनियों को कॉल, डेटा और वैधता जैसे प्लान प्रतिस्पर्धा के आधार पर तय करने की छूट है. इसी प्रतिस्पर्धा के चलते उपभोक्ताओं के लिए दरें लगातार कम होती गईं.

सस्ते डेटा का सामाजिक और आर्थिक असर
कम कीमत वाले इंटरनेट ने भारत में सिर्फ डिजिटल खपत नहीं बढ़ाई, बल्कि सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों को भी नया आकार दिया है. ग्रामीण क्षेत्रों में ऑनलाइन शिक्षा का विस्तार हुआ है, छोटे व्यापारी डिजिटल भुगतान अपना रहे हैं, स्टार्टअप वैश्विक बाजारों के लिए सेवाएं विकसित कर रहे हैं और कंटेंट क्रिएटर्स छोटे कस्बों से अंतरराष्ट्रीय दर्शकों तक पहुंच बना रहे हैं. जहां कई देशों में इंटरनेट अब भी एक महंगा मासिक खर्च माना जाता है, भारत में यह आम नागरिक की दैनिक जरूरतों में शामिल हो चुका है.

आंकड़ों से आगे की कहानी
अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ (ITU) के आंकड़े भारत की कम मोबाइल लागत की पुष्टि करते हैं. हालांकि, असली तस्वीर आंकड़ों से आगे जाकर दिखती है. कम कीमत, विशाल उपभोक्ता आधार और तेज़ डिजिटल अपनाने की क्षमता—इन कारणों से भारत आज दुनिया के सबसे बड़े और सबसे किफायती मोबाइल डेटा बाजारों में अपनी जगह बना चुका है. और शायद यही वजह है कि वैश्विक डिजिटल चर्चा में अब भारत को केवल एक उपभोक्ता के रूप में नहीं, बल्कि डिजिटल ट्रेंड तय करने वाले प्रमुख बाजार के तौर पर देखा जा रहा है.

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