Vedant Samachar

IndusInd का इतना बड़ा हिस्सा खरीदेगा HDFC बैंक, क्या निवेशकों पर पड़ेगा कोई असर?

Vedant Samachar
4 Min Read

देश के सबसे बड़े निजी क्षेत्र के बैंक, HDFC बैंक को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) से एक खास मंजूरी मिल गई है. यह मंजूरी IndusInd बैंक में हिस्सेदारी बढ़ाने से जुड़ी है. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने 15 दिसंबर को जारी एक पत्र के माध्यम से HDFC बैंक को यह अनुमति दी है कि वह IndusInd बैंक में 9.50% तक की कुल हिस्सेदारी( aggregate holding) रख सकता है. यह मंजूरी अगले एक साल के लिए, यानी 14 दिसंबर, 2026 तक वैध रहेगी. केंद्रीय बैंक ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी स्थिति में यह हिस्सेदारी IndusInd बैंक की चुकता शेयर पूंजी (Paid-up Share Capital) या वोटिंग अधिकारों के 9.50% से ज्यादा नहीं होनी चाहिए.

सीधे निवेश नहीं करेगा HDFC बैंक
दरअसल, बैंक और उसकी समूह की कंपनियों का संयुक्त निवेश पहले से तय 5% की सीमा को पार करने की स्थिति में था. नियमों के मुताबिक, सीमा बढ़ाने के लिए रेगुलेटर की अनुमति अनिवार्य थी, जिसके चलते बैंक ने 24 अक्टूबर, 2025 को RBI के पास आवेदन किया था. HDFC बैंक का इरादा IndusInd बैंक में “प्रत्यक्ष निवेश” (Direct Investment) करने का नहीं है. यह मंजूरी मुख्य रूप से HDFC समूह की अन्य कंपनियों के लिए ली गई है.

चूंकि HDFC बैंक इन कंपनियों का प्रमोटर या स्पॉन्सर है, इसलिए इन सभी के द्वारा किए गए निवेश को एक साथ जोड़कर देखा जाता है. जिन कंपनियों के निवेश को इस मंजूरी के तहत गिना जाएगा, उनमें प्रमुख रूप से HDFC म्यूचुअल फंड, HDFC लाइफ इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड, HDFC एर्गो जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड, HDFC पेंशन फंड मैनेजमेंट लिमिटेड और HDFC सिक्योरिटीज लिमिटेड शामिल हैं. यानी, ये कंपनियां अपने कारोबार के हिस्से के रूप में IndusInd बैंक के शेयर खरीद सकेंगी.

क्या है ‘एग्रीगेट होल्डिंग’ का नियम?
इस पूरे मामले में ‘एग्रीगेट होल्डिंग’ शब्द सबसे अहम है. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के वाणिज्यिक बैंक – शेयरों या वोटिंग अधिकारों का अधिग्रहण और होल्डिंग निर्देश, 2025 के अनुसार, किसी भी बैंक समूह की कुल हिस्सेदारी को तब ‘एग्रीगेट’ माना जाता है, जब उसमें बैंक की खुद की हिस्सेदारी के साथ-साथ उसके प्रबंधन या नियंत्रण वाली अन्य कंपनियों, म्यूचुअल फंड्स और ट्रस्टीज की हिस्सेदारी को भी जोड़ा जाए.

RBI के इस नियम का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी वित्तीय संस्थान किसी दूसरे बैंक में परोक्ष रूप से इतना प्रभाव न बना ले जिससे बैंकिंग व्यवस्था में कोई असंतुलन पैदा हो. यही कारण है कि 5% से ऊपर की हिस्सेदारी जाते ही RBI की विशेष अनुमति लेना अनिवार्य हो जाता है.

निवेशकों पर क्या होगा असर?
आम निवेशकों के मन में यह सवाल आना स्वाभाविक है कि इस खबर का उनके पोर्टफोलियो पर क्या असर पड़ेगा. बैंक ने साफ किया है कि यह निवेश उनके “सामान्य कामकाज” का ही एक हिस्सा है. सरल शब्दों में समझें तो, अगर आपने HDFC म्यूचुअल फंड या इंश्योरेंस प्लान में पैसा लगाया है, तो कंपनी आपके पैसे को बढ़ाने के लिए इंडसइंड बैंक के शेयरों में निवेश कर रही है. इसका मकसद ग्राहकों को भविष्य में बेहतर रिटर्न देना है.

वहीं, शेयर बाजार के लिहाज से देखें तो इंडसइंड बैंक के मौजूदा शेयरधारकों के लिए यह एक सकारात्मक संकेत हो सकता है. जब HDFC जैसा बड़ा और भरोसेमंद समूह किसी बैंक में हिस्सेदारी बढ़ाता है, तो बाजार में उस शेयर के प्रति विश्वास और मजबूत होता है. यह किसी तरह का ‘टेकओवर’ या कंपनी पर कब्जा करने की कोशिश नहीं है, बल्कि सिर्फ मुनाफे के लिए किया गया एक सुरक्षित वित्तीय निवेश है जिसे अब RBI की मंजूरी मिल गई है.

Share This Article