नई दिल्ली ,13 दिसंबर । हिमाचल प्रदेश में रेल कनेक्टिविटी को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम उठाते हुए भानुपल्ली–बिलासपुर–बेरी (63 किमी) नई रेल लाइन परियोजना को मंजूरी दे दी गई है। यह परियोजना 6,753 करोड़ रुपये की लागत से लागत-साझाकरण आधार पर स्वीकृत की गई है, जिसमें केंद्र सरकार की हिस्सेदारी 75 प्रतिशत और हिमाचल प्रदेश सरकार की हिस्सेदारी 25 प्रतिशत होगी। इसके अतिरिक्त, 70 करोड़ रुपये से अधिक की भूमि लागत पूरी तरह हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा वहन की जाएगी। भूमि लागत सहित परियोजना का विस्तृत अनुमान 6,753 करोड़ रुपये तय किया गया है।
परियोजना के लिए हिमाचल प्रदेश में कुल 124 हेक्टेयर भूमि की आवश्यकता है, जिसके मुकाबले राज्य सरकार अब तक केवल 82 हेक्टेयर भूमि ही उपलब्ध करा पाई है। बिलासपुर से बेरी खंड की भूमि अभी तक हस्तांतरित नहीं की गई है, जिससे परियोजना की प्रगति प्रभावित हो रही है। इसके बावजूद परियोजना पर कार्य प्रारंभ कर दिया गया है।
अब तक इस परियोजना पर कुल 5,252 करोड़ रुपये का व्यय हो चुका है। लागत-साझाकरण व्यवस्था के तहत हिमाचल प्रदेश सरकार को 2,711 करोड़ रुपये का योगदान देना था, लेकिन राज्य सरकार ने अब तक केवल 847 करोड़ रुपये ही जमा किए हैं। इस प्रकार राज्य सरकार पर 1,863 करोड़ रुपये का बकाया है, जिसका असर परियोजना की गति पर पड़ रहा है। केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए राज्य सरकार का सहयोग आवश्यक है।
इस बीच, हिमाचल प्रदेश का रेल बजट पिछले एक दशक में रिकॉर्ड स्तर तक बढ़ा है। वर्ष 2009-14 के दौरान जहां रेल बजट औसतन 108 करोड़ रुपये प्रति वर्ष था, वहीं 2025-26 में यह बढ़कर 2,716 करोड़ रुपये हो गया है, जो 25 गुना से अधिक की वृद्धि को दर्शाता है।
राज्य में रेल संपर्क सुधार के लिए कई अन्य परियोजनाओं पर भी काम जारी है। नांगल बांध–ऊना–अंब अंदौरा–दौलतपुर चौक (60 किमी) खंड में रेल परिचालन से कनेक्टिविटी में सुधार हुआ है। दौलतपुर चौक–तलवारा (52 किमी) और चंडीगढ़–बद्दी (28 किमी) नई रेल लाइनों पर कार्य प्रगति पर है। चंडीगढ़–बद्दी लाइन पर 1,540 करोड़ रुपये की लागत से काम शुरू किया गया है। वहीं, बद्दी–घनाउली (25 किमी) नई रेल लाइन के लिए सर्वे पूरा कर विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार कर ली गई है।
इसके अलावा, रक्षा मंत्रालय द्वारा बिलासपुर–मनाली–लेह रेल लाइन को रणनीतिक परियोजना के रूप में चिन्हित किया गया है। यह 489 किमी लंबी प्रस्तावित रेल लाइन हिमालय के दुर्गम क्षेत्रों से होकर गुजरेगी, जिसमें करीब 270 किमी सुरंगें शामिल हैं। डीपीआर के अनुसार इस परियोजना की अनुमानित लागत 1.31 लाख करोड़ रुपये है।
रेल मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि किसी भी रेलवे परियोजना की स्वीकृति और समयबद्ध पूर्णता कई कारकों पर निर्भर करती है, जिनमें भूमि अधिग्रहण, वन मंजूरी, वैधानिक स्वीकृतियां, भौगोलिक परिस्थितियां और राज्य सरकार का सहयोग प्रमुख हैं।
केंद्रीय रेल, सूचना एवं प्रसारण तथा इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने यह जानकारी राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में दी।



